बलात्कार की शिकार महिला के समर्थन नेटवर्क में शामिल लोगों को जमानत देने से इनकार किया जाना लिंग-संबंधित विषयों के प्रति संवेदनशील न्यायपालिका की ज़रुरत की ओर साफ़ इशारा करता है

Amnesty International India
Bangalore/New Delhi: 18 July 2020 6:36 pm

बिहार के अररिया जिले के मजिस्ट्रेट द्वारा बलात्कार का शिकार हुई एक महिला और कानूनी प्रक्रियाओं में उनकी मदद कर रहे दो सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ कठोर व्यवहार के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक, अविनाश कुमार ने कहा:

“बिहार में 22 साल की सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई एक महिला और उनकी सहायता कर रहे दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को कोविड-19 के बीच सप्ताह भर जेल में रखा जाना अत्यधिक और गैरवाजिब था। 17 जुलाई 2020 को, अररिया के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जीवित की जमानत को तो मंज़ूरी दी, लेकिन दोनों सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिरासत की अवधि को बढ़ाने का फैसला दिया। बलात्कार का शिकार हुए उत्तरजीवीयों को पहले से ही न्याय पाने के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो उनके द्वारा अनुभव की गयी पीड़ा को और बढ़ा देते हैं। यौन हिंसा के हर मामले में अत्यंत सावधानी बरती जानी चाहिए।” लिंग-संबंधी मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता की कमी के एक दूसरे उदाहरण में, अररिया की स्थानीय मीडिया इकाइयों ने जीवित के नाम और उनकी पहचान का भी खुलासा किया है।

न्यायाधीश वर्मा की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में भारत में संवेदनशील न्यायाधीशों की कमी को रेखांकित किया गया है और अदालतों को संवेदनशील बनाने और उत्तरजीवी के लिए एक अनुकूल और गैर-शत्रुतापूर्ण वातावरण बनाने के लिए दिशा-निर्देश तय किये जाने की सिफारिश की गयी है। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि के तहत संरक्षित सभी अधिकारों को वास्तविकता में बदलने के लिए महिलाओं की न्याय तक पहुंच ज़रूरी है। इस संधि पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं । महिलाओं के खिलाफ सभी

प्रकार के भेदभावों के उन्मूलन के लिए गठित समिति द्वारा ‘महिलाओं के लिए न्याय तक पहुंच से संबंधित सामान्य सिफ़ारिशें’ के तहत कहा गया है कि न्यायाधीशों को न्यायायिक मामलों की सुनवाई के दौरान लिंग-संबंधित संवेदनशील नज़रिया अपनाना चाहिए। इन सिफ़ारिशें के तहत राज्यों को लिंग-आधारित हिंसा से संबंधित मुक़द्दमों और कानूनी कार्यवाही में भाग लेने के लिए नागरिक समाज को प्रोत्साहित करने के लिए भी कहा गया है।

भारत में यौन हिंसा की रिपोर्ट बेहद कम पैमाने पर दर्ज कराई जाती हैं। 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, किसी भी प्रकार की शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव करने वाली महिलाओं में से 77% ने कभी भी इस हिंसा से बचाव के लिए मदद नहीं मांगी या किसी को भी इस हिंसा के बारे में नहीं बताया। हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में से केवल 3% ने पुलिस से मदद मांगी। न्याय प्रणाली में विश्वास की कमी और हिंसा से जुड़े लांछन, कई महिलाओं को बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने से रोकते हैं।

“यौन हिंसा केवल शारीरिक अखंडता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिक अखंडता के अधिकार का भी उल्लंघन है। एक जीवित और उसके समर्थन में खड़े लोगों को जेल भेजा जाना, न केवल इस उल्लंघन को जारी रखता है, बल्कि उसे फिर से पीड़ित और कलंकित भी करता है। उत्तरजीवी की ज़रूरतों को अपराध करार देने की बजाय उन्हें पूरा किया जाना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए और जेलों में कोविड-19 के फैलने की खतरनाक रफ़्तार को देखते हुए, सामाजिक कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए,” रीना टेटे, प्रबंधक, लिंग और पहचान आधारित हिंसा कार्यक्रम, ने कहा।

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पृष्ठभूमि
10 जुलाई 2020 को, बिहार के अररिया जिले में एक 22 वर्षीय सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई महिला, मजिस्ट्रेट के सामने इस घटना के बारे में अपना बयान दर्ज कराने के दौरान उत्तेजित हो गयी। उनकी सहायता के लिए अदालत परिसर में मौजूद जन जागरण शक्ति संगठन की एक सामाजिक कार्यकर्ता ने जीविता को उसका बयान पढ़ कर सुनाए जाने का अनुरोध किया। जवाब में, मजिस्ट्रेट ने जीविता और उनके साथ मौजूद दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालत की अवमानना के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 353 (लोक-सेवक को अपने

कर्त्तव्य के निर्वहन से भयोपरत करने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), धारा 228 (न्यानयक कार्रवाई में बैठे एक लोक-सेवक का जानबूझकर अपमान या उसके कार्य में रुकावट) और धारा 188 (लोक-सेवक द्वारा विधिवत जारी किये गए आदेश की अवहेलना) के तहत मामला दर्ज किया। इन तीनों को फिर अररिया से 200 किलोमीटर दूर एक जेल में भेज दिया गया। 17 जुलाई 2020 को, जीविता की जमानत तो मंज़ूर की गई, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिरासत को और आगे बढ़ा दिया गया।

कोविड-19 महामारी को मद्देनज़र रखते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को जेलों में भीड़ को कम करने को कहा है। अब तक, भारत की जेलों में बंद कम से कम 1441 व्यक्तियों को कोविड संक्रमण होने की पुष्टि की जा चुकी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की लगातार हिरासत, उनके जीवन को गंभीर जोखिम में डालती है।

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