भारत में महिला राजनेता ट्विटर पर करती हैं चौंका देने वाले पैमाने पर दुर्व्यवहार का सामना; एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के अध्ययन का खुलासा

Amnesty International India
Bangalore/New Delhi: 23 January 2020 9:40 am

“ट्रोल पैट्रोल इंडिया: एक्सपोजिंग ऑनलाइन एब्यूज फेस्ड बाय वुमेन पॉलिटिशियंस इन इंडिया” शीर्षक वाले एक नये अध्ययन के डेटा से यह उजागर हुआ है कि भारत में महिला राजनेताओं को ट्विटर पर चौंका देने वाला पैमाने पर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। अध्ययन क्राउडसोर्सिंग, मशीन लर्निंग और डेटा विज्ञान के इस्तेमाल के ज़रिये किया गया था। इसमें 95 महिला राजनेताओं को भेजे गए लाखों ट्वीट की समीक्षा की गयी जो कि भारत में एक अभूतपूर्व पैमाने पर किया गया विश्लेषण है, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा।

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एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने एमनेस्टी इंटरनेशनल-अंतर्राष्ट्रीय सचिवालय (एआई-आईएस) के सहयोग से यह अध्ययन भारत में महिला राजनेताओं के साथ ऑनलाइन दुर्व्यवहार के स्वरूप और पैमाने को मापने के लिए किया। अध्ययन में यह पाया गया कि जो महिलाएं अपनी राय ऑनलाइन व्यक्त करती हैं, उन्हें न केवल उनकी राय के लिए, बल्कि उनकी अलग अलग अपरिवर्तनीय पहचानों – जैसे लिंग, धर्म, जाति, वैवाहिक स्थिति और कई अन्य पहचानों – के लिए भी अभद्र भाषा का निशाना बनाया जाता है।

“‘मुक्त अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित स्थान’ के रूप में प्रचलित किये गए ट्विटर को एक ऐसा मंच बनाने की कल्पना की गई थी जहाँ महिलाओं, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित हाशिए पर खड़े सभी समुदायों को अपनी आवाज़ बुलंद करने का समान अवसर मिलेगा। हालांकि पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राजनीतिक गोल-बंदी और अभियानों के लिए एक अपरिहार्य उपकरण के रूप में सामने आए हैं, लेकिन महिलाओं को नियमित रूप से और लगातार इन प्लेटफॉर्म पर दुर्व्यवहार का निशाना बनाया जाता है, जिसका प्रभाव उनकी आवाज़ को दबा देने का होता है,” अविनाश कुमार, कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया।

अध्ययन में, भारत में 2019 के आम चुनावों के पहले, उनके दौरान और उनके तुरंत बाद की मार्च-मई 2019 तक की तीन महीने की अवधि में, 95 भारतीय महिला राजनेताओं का उल्लेख करते हुए 114,716 ट्वीट का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में वैचारिक इंद्रधनुष के सभी रंगों के राजनीतिक विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला राजनेताओं को शामिल किया गया था। ट्वीट में किये गए उल्लेखों का बारीक़ विश्लेषण हमारी माइक्रोसाइट ‘ट्रोल पैट्रोल इंडिया’ के माध्यम से 82 देशों के 1,900 से अधिक डिजिटल वालंटियरों की मदद से किया गया जिनमें से 1,095 डिजिटल वालंटियर भारत से थे।

विश्लेषण में पाया गया कि अध्ययन में शामिल 95 महिला राजनेताओं का उल्लेख करने वाले 13.8% ट्वीट या तो “समस्यात्मक” थे या “अपमान-जनक” थे। इसका अर्थ हुआ कि इन सभी महिलाओं ने हर रोज़ कुल मिलाकर 10,000 से अधिक समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट का सामना किया। अध्ययन में उन ट्वीट को समस्यात्मक सामग्री के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें चोट पहुँचाने वाली या शत्रुतापूर्ण बातें कही गयी हों खासकर अगर उसे कई बार दोहराया गया हो, लेकिन उनकी तीव्रता दुर्व्यवहार की सीमा रेखा के अंदर हो।

यह भी पाया गया कि मुसलमान महिला राजनेताओं को अन्य धर्मों की महिला राजनेताओं की तुलना में 94.1% अधिक नस्लवादी या धार्मिक अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के अलावा अन्य राजनीतिक दलों की महिला राजनेताओं ने भी तुलनात्मक रूप से अधिक दुर्व्यवहार का सामना किया। अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष नीचे दिए गए हैं।

 

ट्विटर की प्रतिक्रिया

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने नवंबर 2019 को ट्विटर इंडिया के साथ अपने निष्कर्षों को साझा किया और रिपोर्टिंग प्रक्रिया, सामग्री नियंत्रण और भाषा की जांच से संबंधित उनकी प्रतिक्रिया मांगी। यह समझने की भी कोशिश की गई कि क्या भारत में 2019 के आम चुनावों के दौरान ऑनलाइन दुर्व्यवहार की रोकथाम करने के लिए ट्विटर द्वारा कोई ख़ास कदम उठाये गए थे।

अपनी प्रतिक्रिया में, ट्विटर ने कहा कि “सार्वजनिक बातचीत से गुमराह करने वाली अभद्र भाषा, स्पैम और अन्य दुर्व्यवहारों से मुक्त ट्विटर बनाना हमारी उच्च प्राथमिकताओं में से एक है। हमने बेहतर और अधिक सुरक्षित सेवा दे पाने की दिशा में प्रगति की है और आगे चलकर ट्विटर पर लोगों के अनुभवों पर सीधा और सकारात्मक असर डालने के लिए सक्रिय तकनीक में हमारा निवेश जारी है।”

लेकिन, कई महिला राजनेताओं ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने बताया कि किस तरह महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण करने की अपनी ज़िम्मेदारी में ट्विटर विफल हो रहा है।

भारतीय जनता पार्टी की शाज़िया इल्मी ने कहा, “अधिक महिलाओं को राजनीति में आना चाहिए। लेकिन इस काम को चुनने की जो कीमत मैं चुकाती हूँ वह बहुत ज़्यादा है। लगातार ट्रोल किया जाना, ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होना, मैं कैसी दिखती हूँ या मेरी वैवाहिक स्थिति या मेरे बच्चे क्यों हैं या नहीं हैं आदि – सभी गंदी बातें जो आप सोच सकते हैं उनके बारे में लगातार टिप्पणियों झेलना, यह सब मेरे द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत में शामिल है। अगर वे मेरे पुख्ता विचारों को पसंद नहीं करते हैं, तो वे मेरे काम पर टिप्पणी नहीं करेंगे, बल्कि हर संभव भारतीय भाषा में मुझे ‘वेश्या’ कहते हैं ”।

आम आदमी पार्टी की आतिशी ने कहा, “सार्वजनिक स्थान पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना व्यक्तिगत तौर पर किसी महिला की ज़िम्मेदारी नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि कोई महिला सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करती है, तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। इसी तरह, अगर कोई महिला ट्विटर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है, तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उस प्लेटफॉर्म की ही ज़िम्मेदारी है”।

कम्युनिस्ट पार्टी इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की कविता कृष्णन ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से कहा, “यह ख़ास तौर पर निराशा और मानसिक रूप से तनावपूर्ण होता है जब आप ट्विटर या फेसबुक को कुछ रिपोर्ट करते हैं और वे यह कहें कि ‘यह उनके मानदंडों का उल्लंघन नहीं करता है’ । मुझे लगता है कि इन प्लेटफार्मों को या तो अपने रिपोर्टिंग प्रक्रिया को ख़त्म ही कर देना चाहिए या यह दिखावा करना बंद करना चाहिए कि वे कोई मानदंड  लागू कर रहे हैं; क्योंकि जब वे उन पर कार्रवाई ही नहीं करने वाले हैं, तो उन्हें रखने का क्या फायदा हुआ”।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की तरफ से ट्विटर के लिए सिफ़ारिशें

ट्विटर की व्यावसायिक ज़िम्मेदारी के तहत यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसकी नीतियाँ पारदर्शी और एक समान हों, और मानवाधिकार मानकों और लिंग-संबंधित संवेदनशीलता पर आधारित हों। इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने पाने के लिए, इस अध्ययन से ट्विटर के लिए कुछ ठोस सिफ़ारिशें निकल कर आयी हैं। उनमें शामिल है:

  • प्लेटफ़ॉर्म पर महिलाओं और अन्य समूहों के खिलाफ हो रहे ऑनलाइन दुर्व्यवहार के स्वरूप और पैमाने के बारे में व्यापक, अर्थ-पूर्ण और बारीक़ व देश-वार जानकारी, और उससे निपटने के लिए उठाये गए कदमों को सार्वजनिक रूप से साझा करना।
  • हिंसा और दुर्व्यवहार की शिकायतों से निपटने की एक सामान और प्रभावी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए अपने रिपोर्टिंग तंत्र में सुधार करना।
  • हिंसा और दुर्व्यवहार को समझने और उसकी पहचान करने की और इस तरह के दुर्व्यवहार को रिपोर्ट किये जाने पर उससे निपटने की ट्विटर की प्रक्रिया के बारे में अधिक स्पष्टता मुहैया कराना।

“ऑनलाइन दुर्व्यवहार महिलाओं को अपमानित और कमतर महसूस करा सकता है, उनमें डर पैदा कर सकता और उनकी आवाज़ को दबा सकता है। महिलाओं और हाशिये पर खड़े समुदायों को एक ’सुरक्षित स्थान’ प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता को ट्विटर को पूरा करना चाहिए। तब तक, ट्विटर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल और उससे पैदा होने वाली चुप्पी, महिलाओं के अभिव्यक्ति और समानता के अधिकार के रास्ते में आड़े आता रहेगा और महिलाओं को हिंसा और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रखने में ट्विटर विफल होता रहेगा”, लिंग और पहचान-आधारित हिंसा कार्यक्रम की प्रबंधक, रीना टेटे ने कहा।

पूरी रिपोर्ट संलग्न है।

नीचे मुख्य निष्कर्ष दिए गए हैं:

भारत में महिला राजनेताओं का उल्लेख करने वाले हर 7 ट्वीट में 1 ‘समस्यात्मक’ या ‘अपमान-जनक’ था

अध्ययन में शामिल 95 महिला राजनेताओं का उल्लेख करने वाले ट्वीट में से 13.8% ट्वीट समस्यात्मक (10.5%) या अपमान-जनक (3.3%) थे। इसका मतलब हुआ कि मार्च और मई 2019 के बीच, 95 महिलाओं का उल्लेख करने वाले 10 लाख ट्वीट समस्यात्मक या अपमान-जनक थे, या अध्ययन में शामिल सभी 95 महिलाओं के लिए प्रति दिन 10,000 से अधिक समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट, या 113 ट्वीट प्रति महिला प्रति दिन !

भारतीय महिला राजनेताओं ने यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका की महिला राजनेताओं के मुकाबले कहीं ज़्यादा दुर्व्यवहार का सामना किया

यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में 323 महिला राजनेताओं द्वारा सामना किए गए ऑनलाइन दुर्व्यवहार को मापने के लिए 2018 में एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा किए गए इसी तरह के एक अध्ययन में पाया गया था कि उन राजनेताओं का उल्लेख करने वाले 7.1% ट्वीट समस्यात्मक या अपमान-जनक थे। ट्रोल पैट्रोल इंडिया के अध्ययन ने, उसी पद्धति का इस्तेमाल करते हुए , लेकिन चुनावों के दौरान एक छोटी अवधि पर ध्यान केंद्रित करने पर पाया कि भारतीय महिला राजनेताओं ने 13.8% समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट का सामना किया, जो कि तुलनात्मक रूप से काफी ज़्यादा है।

ट्विटर पर प्रमुख और लोकप्रिय महिला राजनेताओं को ज़्यादा निशाना बनाया गया

उल्लेखों की संख्या और महिला राजनेताओं को मिलाने वाली अपमान-जनक सामग्री के अनुपात के बीच एक साफ़ सह-संबंध है। राजनेता जितनी ज़्यादा प्रमुख हो, उन्हें उतना ही अधिक अभद्र भाषा का सामना करना पड़ता है।

हमने इसकी पुष्टी करने के लिए राजनेताओं को उनके उल्लेख के अनुपात के आधार पर वर्गीकृत किया। शीर्ष की 10 सबसे अधिक उल्लेखित राजनेताओं को औसतन 14.8% समस्यात्मक और अपमान-जनक ट्वीट मिले जबकि अन्य महिला राजनेताओं को औसतन 10.8% ट्वीट। इसका मतलब हुआ कि शीर्ष की 10 राजनेताओं को सभी उल्लेखों के 74.1% ट्वीट प्राप्त हुए, लेकिन समस्यात्मक या अपमान-जनक उल्लेखों में उनका हिस्सा 79.9% था।

हर 5 समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट में 1 सेक्सिस्ट या महिला-विरोधी था

डिकोडर्स को सेक्सिस्म और/या महिला-विरोधी, जातीय या धार्मिक अप-शब्द, नस्लवाद, जातिवाद, होमोफोबिया या ट्रांसफोबिया, यौन धमकियाँ, शारीरिक धमकियाँ या ‘अन्य’ तरह के दुर्व्यवहार वाली ट्वीट की श्रेणियों में वर्गीकृत करने को कहा गया था। ‘अन्य’ का इस्तेमाल तब किया गया जब कोई ट्वीट समस्यात्मक या अपमान-जनक सामग्री की विभिन्न श्रेणियों की परिभाषा में फिट नहीं हुई।

गौर देने वाली बात है कि ज़्यादातर ट्वीट “अन्य” श्रेणी (74.1%) में डाली गयी जो बताता है कि अधिकांश समस्यात्मक सामग्री किसी भी सुझाई गई श्रेणियों में फिट नहीं हुई। फिर भी, समस्यात्मक या अपमान-जनक पायी गयी सभी ट्वीट में से, लगभग 5 उत्तरों में से 1 में सेक्सिज्म या महिला-विरोधी सामग्री पायी गयी।

सेक्सिज्म या महिला-विरोधी सामग्री वाली ट्वीट पर गहरी नजर से देखने से मालूम हुआ कि हर तरह की राजनीतिक विचारधारा और ताल्लुक, धर्म, जाति, नस्ल, उम्र, वैवाहिक स्थिति और चुनाव परिणाम वाली महिलाओं ने सेक्सिज्म का सामना किया था।

मुसलमान महिला राजनेताओं को अन्य धर्मों की महिला राजनेताओं की तुलना में 94.1% अधिक नस्लवादी या धार्मिक अप-शब्दों का सामना करना पड़ा

जिन महिला राजनेताओं को मुसलमान के रूप में देखा जाता है उन्होंने अन्य धर्मों की महिलाओं की तुलना में 55.5% अधिक समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट का सामना किया। मुसलमान महिला राजनेताओं का उल्लेख करने वाले समस्यात्मक या अपमान-जनक सामग्री में से 26.4% में नस्लवादी/धार्मिक अप-शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जो हिंदू महिलाओं (13.7%) के अनुपात का दोगुना है।

हाशिए पर खड़ी जातियों से आने वाली महिला राजनेताओं को अन्य जातियों की महिलाओं की तुलना में 59% अधिक जाति-आधारित दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा

हाशिए पर खड़ी जातियों की महिलाओं को सामान्य जातियों की महिलाओं की तुलना में 59% अधिक जाति-आधारित अप-शब्द भरी भाषा का सामना करना पड़ा। समस्यात्मक या अपमान-जनक सामग्री वाली ट्वीट में, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों जैसी हाशिए पर खड़ी जातियों की महिलाओं (8.6%) को सामान्य (5.4%) या अज्ञात जातियों (7.2%) की महिलाओं की तुलना में अधिक जाति-आधारित अप-शब्दों का सामना करना पड़ा।[1]

इससे ज़ाहिर होता है कि हाशिए पर खड़ी जातियों की महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली समस्यात्मक या अपमान-जनक सामग्री में उनकी जातिगत पहचान एक प्रमुख तत्व है।

‘भारतीय जनता पार्टी के अलावा अन्य पार्टियों’ की महिला राजनेताओं ने अधिक दुर्व्यवहार का अनुभव किया

ट्वीट में उल्लेख किये जाने वाले राजनेताओं में से अधिकांश (लगभग 76%) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के थे, और हमारे सैंपल में लगभग 62% ट्वीट में इनमें से किसी एक पार्टी की महिला राजनेता का उल्लेख था। सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा की तुलना में, ‘अन्य दलों’[2] की महिला राजनेताओं ने 56.7% अधिक समस्यात्मक या अपमान-जनक ट्वीट का सामना किया, जबकि आईएनसी नेताओं ने भाजपा की तुलना में 45.3% अधिक अपमान-जनक या समस्यात्मक ट्वीट का सामना किया।

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें:

1) इस अध्ययन में हाशिये पर खड़ी जातियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के राजनीतिज्ञ शामिल हैं। अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को भारत में ऐतिहासिक रूप से वंचित लोगों के समूह के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गयी है। किसी राज्य या केंद्र-शासित प्रदेश के संबंध में कौन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति होगा यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 में परिभाषित किया गया है। अध्ययन के लिए, महिलाओं की जाति संबंधित जानकारी, ‘लोक ढाबा’ से ली गई थी, जो अशोका विश्वविद्यालय की एक पहल है। ‘अघोषित जाति’ में उन लोगों को शामिल किया गया है, जिन्होंने या तो सार्वजनिक रूप से अपनी जाति घोषित नहीं की है और/या एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया उनकी जाति पहचान तय करने में असमर्थ रहा है।

2) ‘अन्य’ पार्टियों में आम आदमी पार्टी, अपना दल, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्रा कज़गम, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, द्रविड़ मुनेत्र कज़गम, जम्मू और कश्मीर राष्ट्रीय कांग्रेस, जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना, समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, युवजन श्रमिका रायथू कांग्रेस पार्टी शामिल हैं। हमने पाया कि कुछ उल्लेखनीय हस्तियों को छोड़कर, इन पार्टियों की ज़्यादातर महिला राजनेताओं के सक्रिय ट्विटर अकाउंट नहीं है।

हम ‘अन्य दलों’ में शामिल पार्टियों के स्तर पर ओर ज़्यादा बारीक़ विश्लेषण नहीं कर पाए क्योंकि हमारे पास हर पार्टी के लिए सांख्यिकीय रूप से ज़रूरी बड़े सैंपल (हर पार्टी के 1 से 4 सदस्य) नहीं थे। इसके अलावा, हमने पाया कि कुछ उल्लेखनीय हस्तियों को छोड़कर, इन पार्टियों की ज़्यादातर महिला राजनेताओं के सक्रिय ट्विटर अकाउंट नहीं है।

Read detailed findings here.

For more information please contact:

Nazia Erum
Email: [email protected]