अपने ही देश में भुला दिये जाने के पांच साल

By Amnesty International India
Bengaluru/ New Delhi: 8 September 2018 3:58 pm

2013 में मुज़फ्फरनगर और शामली में हुए दंगे के पीड़ित आज भी नाउमींदी में न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं। दंगों से आहत हुए लोग जो अपने घरों से बेघर हुए थे आज भी पुनर्वास बस्तियों की मलीनता के बीच अपना जीवन काट रहे हैं और सामूहिक बलात्कार की शिकार वह सात महिलायें जिन्होंने थानों में मामले दर्ज करने की हिम्मत दिखाई थी, वे आज भी न्याय से वंचित हैं, ऐसा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने दंगों की पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर कहा।

उत्तरप्रदेश शासन ने मुज़फ्फरनगर और शामली में हुए दंगों के पीड़ितों को पूरी तरह से भुला दिया है हाल के वर्षों में देश में हुए सांप्रदायिक हिंसा की सबसे घातक घटना के पीड़ितों के प्रति यह उदासीनता किसी भी शर्त पर स्वीकार्य नहीं है जिस अन्याय का सामना इन पीड़ितों को करना पड़ा है उसके निवारण के लिए शासन ने कोई कदम नहीं उठाये हैं पुनर्वासन और मुआवज़े के प्रति शासन के उठाये गए कदम बिकुल अपर्याप्त हैं,” अस्मिता बासु, कार्यक्रम निर्देशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया, ने कहा।

मुज़फ्फरनगर और शामली की सात साहसी महिलाओं ने, डराने और धमकाने की लगातार कोशिशों के बावजूद, सामूहिक बलात्कार के मामले दर्ज कराये थे। लेकिन, पांच सालों के बाद भी उन्हें न्याय मिलाने के आसार नज़र नहीं आते अपनी ज़िन्दगियों और रोज़ी रोटी को फिर से जुटा पाने में उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है,” अस्मिता बासु ने कहा

इन सात मामलों में से किसी में भी अभी तक आरोपियों को सज़ा नहीं हुई है   2016 में, मामला दर्ज कराने वाली एक पीड़िता की अपने बच्चे को जन्म देते समय मृत्यु हो गयी

आरज़ू (नाम बदला गया है), पीड़िताओं में से एक, ने अगस्त 2018 में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया, “मैं अब पूरी तरह से विश्वास खो चुकी हूँ शिकायत दर्ज़ करके अब पूरे पांच साल बीत चुके हैं इतने सालों में मेरी या मेरे परिवार की मदद करने कोई भी नहीं आया अब मुझे अपने पति की हिफाज़त और अपने परिवार को पालने की चिंता है आरज़ू , जो पांच बच्चे की मां है और जिनके साथ दंगों के दौरान बलात्कार हुआ था, अब गरीबी और गन्दगी के बीच कांधला (शामली) स्थित पुनर्वास बस्ती में रह रही है

रेहाना अदीब, मुज़फ्फरनगर में काम कर रही एक कार्यकर्ता ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए कहा, “पीड़ितों पर सामाजिक और राजनैतिक तौर पर दबाव डाला जा रहा है न्यायतंत्र को जिस तरह काम करना चाहिए था उस तरह उसने काम नहीं किया   इनके साथ बलात्कार करने वाले सालों से बाहर खुले घूम रहे हैं   अपने मामलों को आगे बढ़ाने में इन्हें अब डर लग रहा है और इसमें इनका दोष नहीं है   इन सात परिवारों में से कुछ के द्वारा समझौता कर लेने, पैसे की पेशकश किये जाने और मंज़ूर किये जाने की खबरें मीडिया में आयी हैं हमें उन वास्तविकताओं को समझना होगा जिनके बीच रहते इन औरतों ने पिछले कई सालों में अपना जीवन जिया है वे डरी हुई हैं और व्ययस्था पर इनका विश्वास पूरी तरह से टूट चूका है

सामूहिक बलात्कार के सभी सात मामलों में पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल करने में कई महीने लगा दिएज़्यादातर मामलों में 6 से 14 महीने उसके बाद मामलों की सुनवाई बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही है तीन मामलों में, प्रथम सूचना रिपोर्ट में पीड़िताओं ने जिन लोगों की पहचान की थी, उन्हें अदालत में पहचानने से इनकार कर दिया इनमें से कुछ ने बाद में यह बताया कि दबाव और धमकियों के चलते अपने खुदकी और अपने परिवार की हिफाज़त को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसा करने को मज़बूर होना पड़ा

2013 की सांप्रदायिक हिंसा में 60 लोग मारे गए थे और 50,000 से ज़्यादा बेघर हुए थे अपने गावों से बेघर हुई सैंकड़ों परिवारों को उस 50,000 रुपये के मुआवज़े से वंचित रखा गया जिसको `सबसे बुरी तरह प्रभावितगाँवों के सभी परिवारों को देने का वादा उत्तर प्रदेश सरकार ने किया था। कुछ मामलों में अफसरी गलतियों की वजह से, कुछ में भ्रस्टाचार की वजह से तो कहीं `परिवारकी असंगत परिभाषा के इस्तेमाल की वजह से

एएफकेआर इंडिया फाउंडेशन (शामली स्थित एक गैरसरकारी संस्था) के निर्देशक अकरम अख्तर चौधरी ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए कहा, “ज़मीनी स्तर पर हालत पहले जैसे ही हैं 2013 में, दंगे के पीड़ित राहत शिविरों में रह रहे थे, तो आज वे पुनर्वास बस्तियों में रह रहे हैं जहाँ पीने का साफ़ पानी, स्वछता और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है दंगा पीड़ितों में से ज़्यादातर को अपना घर और उसमें मौजूद हर चीज़ को छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। शासन ने उन्हें दूसरी जगह पर बसने में मदद करने के लिए मुआवज़ा देने का वादा किया था पर ऐसे 200 से भी ज़्यादा परिवार हैं जिन्हें पिछले पांच सालों में एक पैसा नहीं मिला है

पुनर्वास बस्तियों में रह रहे परिवारों में ज़्यादातर को बुनियादी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं एक आंकलन के अनुसार मुज़फ्फरनगर की 82% बस्तियों में और शामली की 97% बस्तियों में पीने के लिए साफ़ और सुरक्षित पानी उपलब्ध नहीं है जबकि मुज़फ्फरनगर की 61% में और शामली की 70% बस्तियों में जलनिकास (नाली) की व्ययस्था नहीं है एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के शोधकर्ताओं ने 2017 में यह पाया कि जहाँ जहाँ वे गए वहां लोग मैली और खतरनाक परिस्थितिओं में जीवनयापन कर रहे थे। शौचालय, जिनमें जल निकासी की अक्सर व्यवस्था नहीं थी, तीन या चार परिवार इस्तेमाल कर रहे थे

मुज़फ्फरनगर और शामली दंगा पीडितों की ओर उत्तर प्रदेश सरकार का यह बेदर्द रुख संवैधानिक मूल्यों के पालन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का उलंघन है दंगा पीड़ितों को गरीबी और भेदभाव के दुष्चक्र के भीतर जीने के लिए बाध्य किया गया है।  उत्तरप्रदेश के मुख्यमत्री यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों की पुकार तुरंत सुनी जाए और न्याय देने में अब और देर हो,” अस्मिता बासु ने कहा

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