भारत: दलित अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी

By Amnesty International India
Bengaluru/ New Delhi: 25 June 2018 2:37 pm

Photo credits: Reuters/Ajay Verma

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आतंकनिरोधी कानून का राजनीतिक इस्तेमाल बंद हो

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया और ह्यूमन राइट्स वॉच ने आज कहा कि भारत सरकार को दलित अधिकार कार्यकर्ताओं को उनके कार्यों के लिए गिरफ्तार करने पर रोक लगानी चाहिए. आतंकवाद संबंधी कथित अपराधों के लिए पांच दलित और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफ्तारी और हिरासत राजनीति से प्रेरित लगती है.

महाराष्ट्र पुलिस ने 6 जून 2018 को सुरेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन, सुधीर ढवाले, शोमा सेन और महेश राउत को भारत के प्रमुख आतंकनिरोधी कानून, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता के कई धाराओं के तहत गिरफ्तार किया.  महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव और उसके आस-पास के गांवों में 1 जनवरी को कथित रूप से जातीय हिंसा भड़काने के लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल ने कहा, “यह पहली बार नहीं है कि दलित और आदिवासी अधिकारों पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को अपर्याप्त सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया गया है. सरकार को भय का माहौल पैदा करने के बजाय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने और शांतिपूर्ण तरीके से इकठ्ठा होने संबंधी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए.”

पूर्व में “अछूत” माने जाने वाले सैंकड़ों दलित 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पुराने उस युद्ध का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे जिसमें ब्रिटिश सेना के दलित सैनिकों ने पेशवा शासक को शिकस्त दी थी. दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी समूहों और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के कथित समर्थकों, जिनमें कुछ भगवा झंडे लिए हुए थे, ने इस आयोजन का विरोध किया कि   यह राष्ट्र विरोधी है क्योंकि यह औपनिवेशिक जीत का जश्न है. इस झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई घायल हुए. दलित मार्च के आयोजकों ने बताया कि उनका मकसद भारत में व्यापक रूप से मौज़ूद उस विचारधारा के खिलाफ अभियान शुरू करना था जिसके कारण  दलितों और मुसलमानों पर हमले होते हैं.

गिरफ्तार लोगों में से एक, गडलिंग पुलिस हिरासत में हैं. अन्य लोगों को 4 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. उन्हें यूएपीए कानून के तहत छह महीने तक आरोप तय किए बिना हिरासत में रखा जा सकता है. दोषी पाए जाने पर उम्रकैद हो सकती है.

ये कार्यकर्ता आदिवासियों, जैसाकि कुछ जनजातीय समूह खुद को यह नाम देते हैं, समेत भारत के कुछ सबसे गरीब और हाशिए वाले समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए वर्षों से काम करते  रहे हैं और सरकारी नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं. 54-वर्षीय धवाले मुंबई के दलित कार्यकर्ता हैं और विद्रोही पत्रिका के संपादक हैं. 47-वर्षीय गडलिंग एक दलित मानवाधिकार वकील हैं और इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स के महासचिव हैं.

पूर्व में प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलो रहे 30-वर्षीय राउत भूमि-अधिकार कार्यकर्ता हैं. उनके कामों में स्थानीय स्तर पर लोगों को संगठित करना शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि खनन परियोजनाओं से प्रभावित क्षेत्रों में लोग निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनें. 60-वर्षीया सेन दलित और महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं जो नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की विभागाध्यक्ष थीं. गिरफ्तारी के एक सप्ताह बाद विश्वविद्यालय ने पुलिस हिरासत में रहने का कारण उन्हें निलंबित कर दिया. 47-वर्षीय विल्सन दिल्ली स्थित सामाजिक कार्यकर्ता हैं और राजनीतिक कैदी रिहाई समिति के सदस्य हैं, जो यूएपीए और अन्य दमनकारी कानूनों के खिलाफ अभियान चलाती है.

यूएपीए के तहत इन पांच कार्यकर्ताओं पर एक आतंकवादी संगठन का सदस्य होने, उसकी मदद करने, उसके लिए रंगरूट भरती करने और धन जुटाने के संदेह हैं. उन पर दंड संहिता के तहत समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और आपराधिक षड्यंत्र रचने का भी आरोप है. आठ जनवरी को पुणे के एक व्यापारी द्वारा दायर की गई पुलिस शिकायत पर यह गिरफ्तारियां हुईं, जिसमें धवाले का नाम संदिग्ध के रूप में दर्ज कराया गया था. अन्य चारों के नाम उस एफ़आईआर में नहीं थे.

अधिकारियों ने इस मामले में नौ अन्य लोगों के नाम भी दर्ज कराए है. उनमें से कई कबीर कला मंच के सदस्य हैं जो गायक, कवि और कलाकारों का पुणे स्थित एक सांस्कृतिक समूह है. यह मुख्यतः दलित युवाओं का समूह है जो संगीत, कविता और नुक्कड़ नाटकों के जरिए दलितों और जनजातीय समूहों के उत्पीड़न, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और हिंदू-मुस्लिम संबंधों जैसे मुद्दों के बारे में जागरूकता फैलाता है. पुलिस का दावा है कि धवाले और कबीर कला मंच के सदस्यों ने 31 दिसंबर, 2017 को आपत्तिजनक गीत गाए और आक्रामक, उत्तेजक भाषणों से लोगों के बीच शत्रुता की भावना पैदा की, जिससे अगले दिन भीमा कोरेगांव में कथित तौर पर हिंसा भड़क गई.

पांच कार्यकर्ताओं की हिरासत की मांग करते हुए, पुलिस ने अदालत से कहा कि इन लोगों ने 31 दिसंबर को सशस्त्र सरकार विरोधी समूह प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के निर्देश और उसकी वित्तीय मदद से यह आयोजन किया था और उनके कार्य “राष्ट्र-विरोधी” थे. पुलिस ने यह भी कहा कि उन्हें कार्यकर्ताओं के घरों से पर्चे, सीडी और किताबें मिलीं, जो दर्शाती हैं कि उन्होंने माओवादियों से संपर्क साधा था और उनके लिए बैठकों की व्यवस्था की थी, जो  पुलिस के अनुसार अवैध गतिविधियों में उनकी संलिप्तता का प्रमाण हैं.

गिरफ्तारी के दो दिन बाद, पुलिस ने बताया कि उन्होंने विल्सन के लैपटॉप से एक पत्र जब्त किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का जिक्र है. कार्यकर्ताओं के समर्थकों का दावा है कि ऐसा कोई भी पत्र मनगढ़ंत है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भारत में सरकार के आलोचकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं, ख़ास कर हाशिए के समुदायों के लिए कार्यरत लोगों को  पुलिस अक्सर आतंकनिरोधी कानूनों के जरिए निशाना बनाती है. अधिकारियों को किसी आंदोलन के वैचारिक समर्थन के लिए दंडित न करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना चाहिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए.”

धवाले और कबीर कला मंच के सदस्यों सहित महाराष्ट्र में कई दलित और आदिवासी कार्यकर्ताओं को पहले भी इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार किया गया है. 2011 में, कबीर कला मंच के छह सदस्यों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था. जनवरी 2013 में, मुंबई उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि किसी अवैध संगठन में सदस्यता की व्याख्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार जैसी मौलिक स्वतंत्रता के आलोक में की जानी चाहिए और कि “निष्क्रिय सदस्यता” अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार नहीं है.

धवाले को 2011 में भी यूएपीए और राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 40 महीने जेल में बिताने के बाद उन्हें बरी कर दिया गया था. उनकी रिहाई के फैसले में कहा गया कि पुलिस गिरफ्तारी, जब्ती और सबूत इकट्ठा करने की कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने में विफल रही. अदालत ने कहा: “समाज में व्याप्त अन्याय को उजागर करने और इस स्थिति को बदलने की जरूरत पर जोर देने को कैसे उनके आतंकवादी संगठन के सदस्य होने का सबूत माना जा सकता है?”

भारतीय अदालतों ने फैसला दिया है कि महज़ एक विशेष दर्शन का समर्थन करने वाला साहित्य रखना अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि “केवल किसी प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता एक व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं बनाती जब तक कि वह हिंसा का सहारा नहीं लेता या लोगों को हिंसा के लिए प्रवृत नहीं करता या हिंसा करके या हिंसा भड़का कर अशांति नहीं पैदा करता है.”

इन निर्णयों के बावजूद, मार्च 2017 में कार्यकर्ता और शिक्षक जी.एन. साईबाबा को यूएपीए के तहत उनके घर में मिले दस्तावेजों और वीडियो के आधार पर दोषी पाया गया. इस आधार पर एक अदालत ने फैसला सुनाया कि वह एक शीर्ष माओवादी संगठन के सदस्य हैं. उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया और ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत सरकार से बार-बार यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि संगठनों पर कोई भी प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने और शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकारों का उल्लंघन न करे. उन्होंने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम रद्द करने का भी आग्रह किया है. इसके प्रावधान “आतंकवाद” की अस्पष्ट और बहुत व्यापक परिभाषाओं का उपयोग करते हैं, यह बिना अभियोग 30 दिनों की पुलिस हिरासत समेत 180 दिनों तक की हिरासत का अधिकार देता है, जमानत को प्रतिबंधित करता है और कुछ हालात में ज़ुर्म का पूर्वानुमान लगाता है.

गांगुली ने कहा, “हाशिए के लोगों के अधिकारों के लिए और सरकार के उत्पीड़न के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों को निशाना बानाने के बजाय सरकार को प्रभावित समुदायों की शिकायतों पर ध्यान देना चाहिए.”

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भारत: दलित हक्क कार्यकर्त्याला ताब्यात घेण्यात आले

दहशतवाद प्रतिबंधक कायद्याचा राजकीय हेतूने प्रेरित वापर थांबवा

ऍमनेस्टी इंटरनॅशनल इंडिया व ह्यूमन राईट्स वॉच यांनी भारतीय अधिकाऱ्यांकडे, आपल्या कामासाठी अटक करण्यात आलेल्या दलित अधिकार कार्यकर्त्यांना सोडून देण्याची मागणी केली. पाच दलित व आदिवासी हक्क कार्यकर्त्यांची दहशतवादाशी-संबंधित गुन्ह्यांसाठी करण्यात आलेली अटक व ताब्यात ठेवणे हे राजकीयदृष्ट्या प्रेरित वाटते.

महाराष्ट्र पोलीसांनी 6 जून 2018 रोजी सुदेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन, सुधीर ढवळे, शोमा सेन, व महेश राऊत  यांना अवैध कारवाया (प्रतिबंध) कायदा (यूएपीए) या भारताच्या मुख्य दहशतवाद प्रतिबंधक कायद्यांतर्गत व भारतीय दंडविधान संहितेच्या विविध कलमांतर्गत अटक केली. त्यांना भीमा कोरेगाव व महाराष्ट्र राज्याच्या जवळपासच्या गावामध्ये 1 जानेवारी रोजी जातीय हिंसा भडकवण्याच्या आरोपाखाली अटक करण्यात आली.

“पुरेसा पुरावा नसतानाही दलित व आदिवासी हक्क कार्यकर्त्यांना अटक करण्यात आल्याची ही पहिली वेळ नाही,” असे ऍमनेस्टी इंटरनॅशनल इंडियाचे आकार पटेल म्हणाले. “सरकारने भीतीचे वातावरण निर्माण करण्याऐवजी लोकांचे अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य, संघटन व शांतनेने एकत्र येणे या अधिकारांचे संरक्षण केले पाहिजे.”

भीमा कोरेगाव येथे 1 जानेवारी रोजी पूर्वी ज्यांना ‘अस्पृश्य’ म्हणून ओळखले जायचे ते शेकडो दलित, 200 वर्षांपूर्वी सत्ताधारी पेशव्यांना ब्रिटीश सैन्यातील दलित सैनिकांनी पराभूत केल्याचे स्मरण करण्यासाठी एकत्र जमले होते. उजव्या-विचारसरणीचे राष्ट्रवादी गट व सत्ताधारी भारतीय जनता पक्षाच्या (भाजपा) भगव्या ध्वजधारी कथित समर्थकांनी या सोहळ्याला विरोध केला. हा कार्यक्रम ब्रिटीशांचा विजय साजरा करत असल्यानं तो देश द्रोही असल्याचा त्यांचा आरोप होता. या संघर्षामध्ये एक व्यक्ती मरण पावली व काही जण जखमी झाले. दलित मोर्चाच्या आयोजकांनी सांगितले की त्यांना भारतात झपाट्याने पसरणाऱ्या या विचारधारेविरुद्ध मोहीम सुरू करायची होती, ज्यातूनच दलित व मुस्लिमांवर हल्ले झाले.

अटक करण्यात आलेल्यांपैकी एक गडलिंग, पोलीसांच्या ताब्यात आहे. इतरांना 4 जुलैपर्यंत न्यायालयीन कोठडीत पाठवण्यात आले आहे. त्यांना यूएपीए अंतर्गत सहा महिन्यांसाठी कोणताही आरोप न ठेवता ताब्यात ठेवता येईल. दोषी ठरल्यास, त्यांना जन्मठेप होऊ शकते.

कार्यकर्त्यांनी भारतातील अतिशय गरीब व सर्वात वंचित समुदायांच्या हक्कांचे रक्षण करण्यासाठी अनेक वर्षं काम केले आहे. यामध्ये आदिवासींचाही समावेश होतो व त्यांनी सरकारी धोरणांवर उघडपणे टीका केली आहे. ढवळे, 54 हे मुंबईतील दलित कार्यकर्ते व विद्रोही या मासिकाचे संपादक आहेत. गडलिंग, 47,  हे दलित मानवाधिकार वकील आहेत व इंडियन असोसिएशन ऑफ पिपल्स लॉयर्सचे महासचिव आहेत.

राऊत, 30, हा माजी पंतप्रधान ग्रामीण विकास अधिछात्र आहे, तो एक जमीन-हक्क कार्यकर्ता असून लोकांना संघटित करून खाण प्रकल्पांमुळे प्रभावित क्षेत्रांमध्ये ते देखील निर्णय प्रक्रियेचा भाग असतील याची खात्री करण्याचे काम तो करतो. सेन, 60, या एक दलित हक्क व महिला हक्क कार्यकर्त्या आहेत, त्या नागपूर विद्यापीठाच्या इंग्रजी विभाग प्रमुख होत्या. त्यांच्या अटकेनंतर एका आठवड्याने, त्यांना पोलीसांनी ताब्यात ठेवल्याने विद्यापीठाने त्यांना निलंबित केले. विल्सन, 47, हा दिल्लीतील सामाजिक कार्यकर्ता व कमिटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटीकल प्रिझनर्सचा सदस्य आहे, जी यूएपीए व इतर दडपशाही कायद्यांविरुद्ध प्रचार करते. हे पाचही कार्यकर्ते दशहतवादी संघटनेचे सदस्य आहेत, त्यांना मदत करतात, व त्यांच्यासाठी नियुक्ती करतात व निधी उभारतात असा संशय आहे. त्यांच्यावर दंडविधानांतर्गत विविध गटांमध्ये व वैमनस्यास बढावा देण्याचा व गुन्हेगारी कट रचल्याचा संशय आहे. पुण्यातील एका व्यावसायिकाने 8 जानेवारीला दाखल केलेल्या तक्रारीद्वारे या व्यक्तींना अटक करण्यात आले, ज्यामध्ये ढवळे यांचे नाव मुख्य संशयित म्हणून नमूद करण्यात आले होते. इतर चौघांची नावे प्राथमिक तपासणी अहवालात देण्यात आली नव्हती.

अधिकाऱ्यांनी या प्रकरणात इतर नऊ लोकांची नावेही नमूद केली आहेत, त्यापैकी काही कबीर कला मंचाचे सदस्य होते. हा पुणे-स्थित गायक, कवी व कलाकारांचा समूह आहे. या समूहात प्रामुख्याने दलित युवकांचा समावेश असून ते संगीत, कविता व पथनाट्यांचा वापर दलित व आदिवासी समूहांवरील अत्याचार, सामाजिक विषमता, भ्रष्टाचार, व हिंदू-मुस्लिम नात्याविषयी जागरुकता निर्माण करण्यासाठी करतात. पोलीसांचा असा दावा आहे की ढवळे व कबीर कला मंचाच्या सदस्यांनी 31 डिसेंबर 2017 रोजी आक्षेपार्ह गाणी म्हटली व आकम्रक व भडकाऊ भाषणांनी शत्रुत्वाची भावना निर्माण केली, तसेच दुसऱ्या दिवशी भीमा कोरेगाव येथे हिंसाचाराला चिथावणी दिली असा आरोप आहे.

पाच कार्यकर्त्यांना पोलीस कोठडी देण्यात यावी अशी मागणी करत, पोलीसांनी न्यायालयाला सांगितलं की कार्यकर्त्यांनी 31 डिसेंबरला भारतीय कम्युनिस्ट पक्ष (माओवादी) या प्रतिबंधित संघटनेच्या सांगण्यावरून कार्यक्रम आयोजित केला होता व त्याला निधी देण्यात आला होता. हा सरकारविरोधी गट असून त्यांचं कृत्य “राष्ट्र-विरोधी” होतं. पोलीसांनी असेही नमूद केले की त्यांना कार्यकर्त्यांच्या घरात पत्रके, सीजी व पुस्तकं मिळाली, ज्यांतून त्यांचा माओवाद्यांशी व्यवहार होता व त्यांच्यासाठी बैठकी आयोजित केल्या, जे पोलीसांच्या म्हणण्याप्रमाणे अवैध कारवायांमध्ये सहभागी होणे आहे.

अटकेनंतर दोन दिवसांनी, पोलीस म्हणाले त्यांनी विल्सनच्या लॅपटॉपवरून एक पत्र हस्तगत केले ज्यामध्ये पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांना ठार मारण्याची योजना नमूद करण्यात आली होती. कार्यकर्त्यांच्या समर्थकांनी ठामपणे सांगितले की अशाप्रकारचे कोणतेही पत्र बनावट आहे.

“भारतामध्ये अनेकदा पोलीसांनी दहशतवाद प्रतिबंधक कायदा सरकारचे टीकाकार व सामाजिक कार्यकर्त्यांविरुद्ध वापरला जातो, विशेषतः उपेक्षित समुदांच्यावतीने काम करणाऱ्यांविरुद्ध,” असे मीनाक्षी गांगुली, ह्यूमन राईट्स वॉच येथे दक्षिण आशिया दिग्दर्शक म्हणाल्या. “अधिकाऱ्यांनी सर्वोच्च न्यायालयाच्या एखाद्या चळवळीला वैचारिक पाठिंबा देण्यासाठी दंड करू नये व अभिव्यक्ती स्वातंत्र्याचे संरक्षण करावे या निर्देशांचे पालन केले पाहिजे.”

महाराष्ट्रातील बरेच दलित व आदिवासी कार्यकर्ते व कबीर कला मंचाच्या सदस्यांना, अशाच आरोपांखाली याआधीही अटक करण्यात आली आहे. कबीर कला मंचाच्या सहा सदस्यांना 2011 मध्ये यूएपीए अंतर्गत अटक करण्यात आली होती. जानेवारी 2013 म्ध्ये, मुंबई उच्च न्यायालयाने निकाला दिला होता की एखाद्या अवैध संघटनेच्या सदस्यत्वाचा भाषण स्वातंत्र व अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य यासारख्या मूलभूत स्वातंत्र्याच्या संदर्भात अर्थ पाहिला पाहिजे, व कारवाई करण्यासाठी केवळ “निष्क्रिय सदस्यत्व” पुरेसे नाही.

ढवळे यांना 2011 साली यूएपीए अंतर्गत अटक व राजद्रोहासाठी अटक करण्यात आली होती, माज्ञ तुरुंगात 40 महिने घालवल्यानंतर त्यांना सोडून देण्यात आले. त्यांच्या सुटकेच्या निकालात नमूद करण्यात आलं होतं की पोलीस अटक, जप्ती व पुरावा गोळा करणे यासाठीच्या कायदेशीर प्रक्रियेचे पालन करण्यात अपयशी ठरले आहेत. न्यायालयाने नमूद केले की: “समाजातले वाईट प्रघात अधोरेखित करून, परिस्थिती बदलण्याच्या गरजेवर जोर देऊन, ते दहशदवादी संघटनेचे सदस्य आहेत असे गृहित कसे धरता येईल?”

भारतीय न्यायालयांनी निकाल दिलेला आहे की विशिष्ट तत्वज्ञान उघड करणारे साहित्य बाळगले हा गुन्हा ठरू शकत नाही. सर्वोच्च न्यायालयाने असाही निकाल दिला आहे की “जोपर्यंत एखादी व्यक्ती हिंसेचा अवलंब करत नाही किंवा लोकांना हिंसा करायला उद्युक्त करत नाही किंवा हिंसेद्वारे किंवा हिंसा भडकवून सार्वजनिक अराजकता निर्माण करत नाही तोपर्यंत केवळ प्रतिबंधित संघटनेचा सदस्य आहे म्हणून एखादी व्यक्ती गुन्हेगार ठरत नाही.”

हा निकालांनंतरही, मार्च 2017 मध्ये, जी. एन. साईबाबा, या कार्यकर्त्या व शिक्षकाला यूएपीएअंतर्गत, त्याच्या घरी आढलेले दस्तऐवज व व्हीडिओंच्या आधारे दोषी ठरविण्यात आले. न्यायालयाने दिलेल्या निकालात तो माओवादी आघाडीचा संघटनेचा एक सदस्य असल्याचा एक पुरावा होता. त्यांनी मुंबई उच्च न्यायालयाला अपील केले आहे.

ऍमनेस्टी इंडिया इंटरनॅशनल व ह्यूमन राईट्स वॉच यांनी भारत सरकारला वारंवार कळकळीची विनंती केली आहे की संघटनांवर घातलेल्या कोणत्याही निर्बंधामुळे आंतरराष्ट्रीय मानवी हक्क कायद्यांतर्गत अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य, संघटन व शांततापूर्ण सभा यांचे उल्लंघन होत नाही. त्यांनी अवैध कारवाया (प्रतिबंध) कायदा रद्द करण्याचीही मागणी केली आहे, याच्या तरतूदींमध्ये “दहशतवादाची” ढोबळ व अतिव्यापक व्याख्या वापरण्यात आली आहे, आरोप निश्चित करण्यापूर्वी 180 दिवसांपर्यंत पोलीस कोठडीत ठेवण्याचे अधिकार आहेत, जामीनावर मर्यादा आहेत, व काही परिस्थितींमध्ये अपराध गृहित धरला जातो.

“उपेक्षित वर्गाच्या हक्कांविषयी व सरकारद्वारे केल्या जाणाऱ्या छळाविरुद्ध बोलणाऱ्यांना लक्ष्य करण्याऐवजी, सरकारने प्रभावित समुदांच्या तक्रारींची दखल घेतली पाहिजे,” असे गांगुली म्हणाल्या.

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