भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से चलती आ रही दमनकारी नीति को ख़त्म करना चाहिए

Amnesty International India
नई दिल्ली / बेंगलुरु: 5 August 2020 4:20 pm

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के निरस्त किये जाने की पहली वर्षगांठ पर, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा कि भारत सरकार को तुरंत सभी राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक हिरासत से रिहा करना  चाहिए, 4जी मोबाइल इंटरनेट को बहाल करना चाहिए, जेलों में भीड़-भाड़ को कम करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए और जम्मू-कश्मीर में पत्रकारों पर हुए हमलों की त्वरित और स्वतंत्र जांच शुरू करनी चाहिए।

“पिछले एक साल के दौरान, भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए न्याय हासिल करने के सभी रास्तों को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त करती आई है। प्रतिनिधित्व का अभाव, इंटरनेट पर प्रतिबंध, भारत के सबसे कड़े क़ानूनों का मनमाना उपयोग, मौखिक आदेशों के आधार पर हिरासत में रखे जाने और स्थानीय मीडिया पर लगाम लगाए जाने के चलते – खासतौर पर कश्मीर में – पिछले पूरा एक साल में जम्मू-कश्मीर के लोगों की आवाज़ों को हम तक पहुँचने से रोका गया”, अविनाश कुमार, कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा।

5 अगस्त 2019 को, भारत सरकार ने एकतरफ़ा निर्णय लेते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया, जिसके तहत संवैधानिक तौर पर जम्मू-कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान की गयी थी। इसके साथ-साथ, राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में भी विभाजित कर दिया गया, जिसके तहत इस क्षेत्र को केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में लाया गया। इन सभी संशोधनों और बदलावों को, संचार माध्यमों पर संपूर्ण प्रतिबंधों, लोगों की आवाजाही पर पाबंदियों और बड़े पैमाने पर लोगों की हिरासत के बीच किया गया।

एक दर्जन पत्रकारों के साथ साक्षात्कार और समाचार रिपोर्टों – प्रिंट एवं डिजिटल और सूचना अधिकार याचिकाओं- के ज़रिये तथ्यों की पुष्टि करने वाले सबूतों को इकट्ठा करने के बाद, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 5 अगस्त 2019 के बाद से इस क्षेत्र में भारत सरकार की दमनकारी रणनीति का अपनी  ‘सिचुएशन अपडेट’ श्रंखला के ज़रिये दस्तावेजीकरण किया है।  (श्रंखला का तीसरा और अंतिम अंक संलग्न है)

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया मानता है कि भारत सरकार की वैध सुरक्षा-संबंधित चिंताएँ हो सकती हैं, जिनसे निपटने के लिए कुछ ख़ास परिस्थितियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं। लेकिन इन प्रतिबंधों को हमेशा सीमित अवधि के लिए और प्रामाण्य रूप से अनुपात में होना चाहिए, जैसा कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय करार (ICCPR) के अनुच्छेद 19 में कहा गया है, और इस करार पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं।

लेकिन, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन करते हुए, पिछले एक साल से चले आ रहे संचार प्रतिबंधों के कारण, कश्मीर की पूरी आबादी को अभिव्यक्ति और राय की स्वतंत्रता के अपने अधिकार से वंचित रखा है। मीडिया को सेंसर किये जाने, राजनीतिक नेताओं को लगातार हिरासत में रखे जाने और महामारी के दौरान बिना किसी सुनवाई के मनमाने तौर पर पाबंदियाँ लगाए जाने ने, इन उल्लंघनों को और जटिल बना दिया है।

2020 में प्रतिबंधों में कुछ ढील दिए जाने के बावजूद, इस क्षेत्र से बाहर आने वाली सूचनाओं पर सरकार के लगभग पूर्ण नियंत्रण को, जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम (PSA) और गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसे दमनकारी क़ानूनों के इस्तेमाल के ज़रिये और ज़्यादा मजबूत बनाया गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 5 अगस्त 2019 के बाद से कम से कम 18 पत्रकारों पर शारीरिक हमले, उन्हें उत्पीड़ित किये जाने और डराये-धमकाए जाने का दस्तावेजीकरण किया है। क्षेत्र में सरकार द्वारा जारी की गई कठोर मीडिया नीति, जिसका उद्देश्य खुले तौर पर “राष्ट्रविरोधी गतिविधियों, फर्जी खबरों और साहित्यिक चोरी” की रोकथाम के ज़रिये “मीडिया में सरकार के कामकाज पर एकरूप वृतांत” बनाना है, ने स्वतंत्र मीडिया के बचे-खुचे अवशेषों को भी ख़तरे में डाल दिया है।

विभिन्न डिजिटल और प्रिंट मीडिया से जानकारी इकट्ठा करने के बाद, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने पाया कि विविध राजनैतिक विचारधाराओं से आने वाले, कम से कम 70 राजनीतिक नेताओं को प्रशासनिक हिरासत में रखा गया था। लेकिन, केंद्र में मौजूदा सत्ताधारी पार्टी – भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) – से जुड़े हुए किसी भी राजनीतिक सदस्य के हिरासत में रखे जाने का एक भी मामला सामने नहीं आया। हालांकि गिरफ्तार किए गए अधिकांश लोगों को रिहा किया जा चुका है, लेकिन कई लोगों को मौखिक आदेशों के आधार पर या PSA जैसे दमनकारी क़ानूनों के तहत अभी भी हिरासत में रखा जा रहा है। यह ICCPR और भारतीय संविधान के तहत निष्पक्ष जांच और न्यायायिक कार्रवाई के उनके अधिकारों का पूर्ण उल्लंघन है।

उनकी रिहाई की शर्तों के तहत, राजनैतिक भाषण देने सहित अन्य सभी प्रकार की राजनैतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित करने वाले अनुबंध पर उनसे हस्ताक्षर कराया जाना, उन्हें हिरासत में लिए जाने जितना ही संगीन है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत, राजनीतिक भाषण को तब ही निषिद्ध किया जा सकता है जब उससे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए सीधा ख़तरा हो, जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा हासिल किए गए आदेशों में, भारत सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया गया है।

एक लॉकडाउन के बाद दूसरे लॉकडाउन का सामना कर रहे जम्मू-कश्मीर के लोगों को कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारी नीतियों ने और अधिक हाशिए की ओर धकेल दिया है और न्याय तक उनकी पहुंच को बुरी तरह प्रभावित किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने पाया कि 2016 और 2019 के बीच जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की श्रीनगर पीठ के समक्ष गैर-कानूनी हिरासत के खिलाफ 300 से भी ज़्यादा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ दायर की गई थीं। लेकिन, 4 अगस्त 2020 तक, केवल 11 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ ही दायर की गई हैं। याचिकाओं की संख्या में इस भारी गिरावट के लिए, सरकार द्वारा कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए लागू किए गए दंडात्मक आपातकालीन उपायों के साथ-साथ बिना रुकावट के ऑनलाइन सुनवाई के लिए ज़रूरी हाई-स्पीड इंटरनेट की कमी को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। राज्य मानवाधिकार आयोग के साथ-साथ महिला और बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए राज्य आयोग जैसे छह अन्य आयोगों को बंद किये जाने के कारण जम्मू-कश्मीर के लोगों के पास अपने मानवाधिकारों के उल्लंघन की सुनवाई का कोई ज़रिया नहीं बचा है।

“जम्मू-कश्मीर में हालत ‘सामान्य’ होने की छवि को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की सरकार की निर्मम कोशिशों और उसके साथ-साथ स्वतंत्र प्रेस की स्वायत्तता पर अंकुश लगाए जाने, पूरे राजनीतिक नेतृत्व को बंदी बनाकर रखे जाने, सरकार के संभावित आलोचकों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार किये जाने और संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाए जाने के ज़रिये जम्मू-कश्मीर की जनता की आवाज़ को दबा दिया गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया सरकार से 4जी मोबाइल इंटरनेट बहाल करने की मांग करता है। हम PSA और UAPA के तहत पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक जांच को बंद किये जाने और नई मीडिया नीति को वापस लिए जाने की भी मांग करते हैं। हम सरकार से यह भी अपील करते हैं उन सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा कर दिया जाए जिन्हें सिर्फ अपने अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण रूप से सम्मिलित होने, संघ बनाने, किसी भी धर्म में मानने की आज़ादी और बराबरी और गैर-पक्षपात के अधिकारों के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि इनका हिरासत में लिया जाना शुरुआत से ही एक गलत कदम था। अधिकारों का सम्मान करने वाली सरकार को पता होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में अत्याचार का अंत जम्मू-कश्मीर के लोगों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है,”अविनाश कुमार ने कहा।

संलग्न:

नई | जम्मू और कश्मीर सिचुएशन (स्थिति) अपडेट और विश्लेषण, 4 अगस्त 2020

जम्मू और कश्मीर सिचुएशन (स्थिति) अपडेट और विश्लेषण, 31 मार्च 2020

जम्मू और कश्मीर सिचुएशन (स्थिति) अपडेट और विश्लेषण, 18 अक्टूबर 2019

 

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