COVID-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में भारत के ग़रीब और हाशिये पर खड़े तबक़ों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

Amnesty International India
Bengaluru/New Delhi: 28 March 2020 2:49 pm

COVID-19 महामारी से लड़ने के लिए भारत में तीन हफ़्तों की राष्ट्रव्यापी तालाबंदी ने लाखों प्रवासी मज़दूरों को असहाय स्थिति में रख छोड़ा है और ग़रीबों को देश भर में ज़रूरी सेवाओं के लिए जूझना पड़ रहा है। भारत सरकार द्वारा महामारी से लड़ने के लिए जो नीतियाँ और योजनाएँ अपनाई जा रही हैं, उनके ज़रिये ग़रीबों और हाशिए के समुदायों की कठिनाइयाँ बढ़ने के बजाय कम होनी चाहिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा।

24 मार्च 2020 को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीविज़न के माध्यम से दिए गए एक भाषण के ज़रिये COVID-19 के और आगे फ़ैलने को रोकने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत 21 दिनों की राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा की। “भारत एक महत्वपूर्ण चरण से गुज़र रहा है और बस एक गलत कदम की वजह से यह घातक वायरस जंगल की आग की तरह फैल सकता है और पूरे देश को खतरे में डाल सकता है। अगर हम लापरवाही करते रहे तो भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी,” प्रधानमंत्री ने देश को बताया।

“यह आवश्यक है कि भारत COVID-19 महामारी से लड़ने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाए। लेकिन, यह भी उतना ही ज़रूरी है कि सबसे कमजोर समुदायों के हितों को महामारी से लड़ने की हर नीति के केंद्र में रखा जाए। राष्ट्रव्यापी तालाबंदी का बुरा असर सबसे ज़्यादा प्रवासी और देहाड़ी वाले मज़दूरों और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों पर पड़ा है। COVID-19 से निपटने के लिए कोई भी कार्रवाई तय करते वक्त, भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन समुदायों की ज़रूरतों और अनुभवों को नज़रअंदाज़ न किया जाए,” एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक, अविनाश कुमार ने कहा।

2018-2019 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के कार्यबल का 93% हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जिन तक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पहुँच सीमित या अपर्याप्त है। जब भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे बंद होने की कगार पर है, ऐसे में लाखों मज़दूरों की नौकरियाँ पहले ही जा चुकी हैं। रहने की अस्थायी या असुरक्षित व्यवस्था और अपर्याप्त भोजन, आश्रय और स्वच्छता सुविधाओं के चलते, कई मज़दूरों के पास अपने घरों को वापस जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। चूंकि तालाबंदी के दौरान बस और रेलवे सेवाओं को भी रद्द कर दिया गया है, इसलिए कई लोग अपने घरों तक चल कर जाने के लिए मजबूर हैं, कुछ लोगों के लिए इसका मतलब 1000 किमी से भी अधिक दूरी तय करना है। रेस्त्रां और होटल बंद होने के कारण, घर की ओर लंबा सफर तय करते समय उनके पास साफ़ पानी और खाने का भी कोई साधन नहीं है। और इन घावों पर नमक छिड़कने का काम राज्य पुलिस तंत्र द्वारा दमन के ज़रिये किया जा रहा है, जिसमें तालाबंदी के उल्लंघन के नाम पर इन मज़दूरों के साथ बदसलूकी, मनमानी गिरफ्तारी और गैर-ज़रूरी या अत्यधिक बल का इस्तेमाल शामिल है।

“देशव्यापी तालाबंदी के चलते लाखों लोग पानी और खाने के लिए जूझने के लिए मजबूर हैं। दुर्भाग्य से इन लोगों के लिए सरकारी तंत्र, COVID-19 महामारी से बड़ा ख़तरा बन गया है। यह बड़े दुःख की बात है और भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महामारी से निपटने के लिए असंवेदनशीलता और बल-प्रयोग के बजाय जनतपरस्त तरीकों का इस्तेमाल किया जाए। सभी परिस्थितियों में अत्याचार और अन्य बद्सलूकियों का इस्तेमाल वर्जित है, और इसे कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह सार्वजनिक स्वस्थ्य से जुडी संकटकालीन परिस्थितियाँ ही क्यों न हों,” अविनाश कुमार ने कहा।

“एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया, भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों से सामाजिक सुरक्षा की पहुँच को बढ़ने के लिए कदम उठाने का आह्वान करता है, ताकि इनमें उन सभी को शामिल किया जा सके जो राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की वजह से अपनी नौकरियाँ खो चुके हैं। हम सरकार से यह भी आग्रह करते हैं कि जिन लोगों को संगरोध में रखा गया है उनके अधिकारों का सम्मान किया जाए और लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा किया जाए, जिसमें पर्याप्त खाना, पानी, आश्रय और स्वच्छता भी शामिल है,” अविनाश कुमार ने कहा।

Photo Courtesy: Aljazeera

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