भारत सरकार की COVID -19 सम्बन्धी कार्रवाई: सरकार को सत्ता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और जम्मू-कश्मीर में मनमाने ढंग से हिरासत में लिये गए लोगों को तुरंत रिहा कर देना चाहिए।

Amnesty International India
बेंगलुरु / नई दिल्ली: 1 April 2020 8:28 pm

अब जब जम्मू-कश्मीर में COVID-19 के चलते तालाबंदी का दूसरा चरण शुरू हो चुका है, तो भारत सरकार को मनमाने ढंग से हिरासत में रखे जा रहे सभी लोगों को तुरंत रिहा कर देना चाहिए; इंटरनेट को पूरी तरह से बहाल करना चाहिए और जम्मू-कश्मीर के लोगों और प्रशासन के बीच भरोसे की भावना बढ़ाने वाले कदम उठाने चाहिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा।

एक दर्जन से अधिक कैदियों, पत्रकारों, वकीलों और व्यापारियों के साथ साक्षात्कार के बाद, और जम्मू-कश्मीर के सरकारी विभागों से 255 सूचना अधिकार अर्जियों और पत्र व्यवहार के ज़रिये हासिल की गयी जानकारी के माध्यम से एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने, मौखिक आदेशों के ज़रिये, वयस्कों और नाबालिगों को अक्सर प्रशासनिक हिरासत में रखे जाने, लंबे समय तक संचार के सभी माध्यमों पर प्रतिबंधों और जम्मू-कश्मीर इलाके में पारदर्शिता के पूर्ण भाव का दस्तावेजीकरण किया है।

“सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात काल की स्थिति के समय जवाबदेही को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए। इंटरनेट पर प्रतिबंध और सीमित चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के साथ साथ इन हालातों में भी गैर-कानूनी और मनमाने ढंग से हिरासत का लगातार इस्तेमाल, COVID-19 की वजह से पैदा होने वाले डर, घबराहट और चिंता को ओर बढ़ाने का ही काम करेगा। जम्मू और कश्मीर के लोग गरिमा के साथ जीने के और COVID-19 से उनके स्वास्थ्य के लिए पैदा होने वाले ख़तरों के बारे में जानकारी पाने के हक़दार हैं। जम्मू और कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों को कमज़ोर करने के बजाय उनकी रक्षा करने के लिए कदम उठाये जाने चाहिए,” एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक अविनाश कुमार ने कहा।

5 अगस्त 2019 को, नागरिक स्वतंत्रता अधिकारों और संचार के सभी माध्यमों पर पाबंदियों के बीच, भारत सरकार ने एकतरफ़ा फैसला लेते हुए, जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। हालांकि आवाजाही की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंध धीरे-धीरे हटा दिए गए थे, लेकिन इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और मनमानी गिरफ्तारियाँ आज भी जारी हैं। 24 मार्च 2020 को, टेलीविज़न के ज़रिये एक भाषण में, भारत के प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने COVID-19 के फैलने को रोकने के लिए 21 दिनों के लिए व्यापक राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा की, जबकि जम्मू-कश्मीर पहले की तालाबंदी से अब भी जूझ रहा है।

5 अगस्त के बाद से, जम्मू और कश्मीर में मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने और नाबालिगों की गिरफ्तारी के मामलों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गयी। सभी इलाकों में जम्मू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA), विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया संहिता के कुछ प्रावधानों जैसे दमनकारी क़ानूनों का बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में रखने के लिए इस्तेमाल किया गया। जम्मू-कश्मीर की 37 तहसीलों (उप-जिलों) और 12 जेलों से एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा इकट्ठा की गयी जानकारी के मुताबिक़ कम से कम 1,249 लोगों को प्रशासनिक रूप से, अर्थात किसी भी आरोप या अधिकारियों द्वारा मुकदमे के बिना, हिरासत में लिया गया था। इनका असर सबसे ज़्यादा कश्मीर क्षेत्र के लोगों को भुगतना पड़ा क्योंकि जेल भेजे गये लोगों में से 90% कश्मीर इलाके से थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के सामने कम से कम 34 बच्चों के मामले भी आए जिन्हें अलग अलग क़ानूनों के तहत जेलों में बंद किया गया है। इसके अलावा, कम से कम 251 कैदियों को जम्मू और कश्मीर के बाहर स्थानांतरित किया गया, जिनमें से कम से कम 23 लोग स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे।

सबसे चौंकाने वाली बात जो एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने पायी वह यह है कि इस इलाके के कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने बिना कोई रिकॉर्ड दर्ज किये, लोगों को हिरासत में रखने के मौखिक आदेश भी जारी किए। यह आदेश दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 के तहत जारी किये गए थे जो प्रशासनिक हिरासत की अनुमति देते हैं। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ‘सांप्रदायिक राजनीति’ का विरोध करने या पार्टी का झंडा ‘हरे रंग’ का  होने या ‘राजनीति की आड़ में’ गतिविधियों चलाने जैसे कारणों के लिए राजनीतिक नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत के व्यापक और अस्पष्ट आदेश जारी किए गए। कई पूर्व बंदियों और उनके परिवारों ने प्रशासन द्वारा प्रतिशोध के डर से अपनी हिरासत के बारे में बोलने के लिए अनिच्छा ज़ाहिर की।

“अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुसार राज्यों को यह सुनिश्चित करना होता है कि उन सभी व्यक्तियों को जिनको स्वतंत्रता से वंचित किया गया हो, उस भाषा में, जिसे वे लिखित रूप में समझते हों, उनकी हिरासत के कारणों और कानूनी मदद के तुरंत और नियमित रूप से उपलब्ध होने के उनके अधिकार के बारे में सूचित किया जाए। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का पूरी तरह उल्लंघन करते हुए, कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने हिरासत के मौखिक आदेश जारी किए। इस तरह के आदेश, हिरासत में लिए गए लोगों से अदालत के समक्ष अपनी हिरासत के ख़िलाफ़ अपील करने की उनकी क्षमता छीन लेते हैं। COVID-19 के चलते, जब पुलिस लोगों को मनमाने तरीके से हिरासत में ले रही है और अत्यधिक बल का प्रयोग कर रही है, इस तरह के शक्ति के दुरुपयोग और जवाबदेही का पूर्ण अभाव तुरंत बंद किया जाना चाहिए,” अविनाश कुमार ने कहा।

29 मार्च 2020 को, जेलों में COVID-19 के फैलने को रोकने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए हालिया फैसले के तहत, जम्मू और कश्मीर सरकार ने अंतरिम जमानत या पैरोल पर कैदियों को रिहा करने के लिए एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया। आदेश में आगे कहा गया था कि कैदियों की रिहाई तय करते समय अपराध की प्रकृति और गंभीरता और सजा की अवधि जैसे आयामों को मद्देनज़र रखा जाए। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया भारत सरकार से आग्रह करता है कि रिहाई के मानदंडों में फिलहाल प्रशासनिक हिरासत में बंद किये गए लोगों को भी शामिल किया जाए, खासकर उनको जिन्हें सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107, 109 और 151 के तहत हिरासत में लिया गया है। हम सरकार से यह भी अपील करते हैं उन सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा कर दिया जाए जिन्हें सिर्फ अपने अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण रूप से सम्मिलित होने, संघ बनाने, किसी भी धर्म में मानने की आज़ादी और बराबरी और गैर-पक्षपात के अधिकारों के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि इनका हिरासत में लिया जाना शुरुआत से ही एक गलत कदम था।

“लोगों और प्रशासन के बीच विश्वास, इस अभूतपूर्व महामारी से लड़ने के लिए बहुत जरूरी है। जम्मू और कश्मीर में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएँ सीमित हैं और इस क्षेत्र में COVID-19 के मामलों की संख्या पहले ही बढ़कर 49 हो गई है। यात्रा पर प्रतिबंधों और संगरोधों को लागू करते वक़्त, यह ज़रूरी है कि भारत सरकार मानव अधिकारों को प्राथमिकता दे और संकट के इस समय में अपनी सत्ता का दुरुपयोग न करे। मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को सरकार को तुरंत रिहा कर देना चाहिए, खासतौर पर उम्र दराज़ कैदियों और बच्चों और गंभीर रूप से बीमार लोगों को। सरकार को हिरासत में रखे गए सभी लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और बिना भेदभाव के स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया करानी चाहिए। सरकार को जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं को भी पूरी तरह से बहाल करना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में COVID-19 महामारी का अंत, वहां के सभी लोगों के सहयोग के बिना नहीं किया जा सकता है,” अविनाश कुमार ने कहा ।

ध्यान दें – अधिक जानकारी, डेटा और विवरण संलग्न दस्तावेज़ में दिए गए हैं।

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