Opinion | Let’s call a bluff, a bluff.

Asmita Basu, Amnesty International India
14 May 2018 3:38 pm

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Image: Public protest at town hall for the Kathua and Unnao Rape case

“How can this happen again?” I thought to myself, watching news of the Unnao and Kathua cases flood the media.

As thousands of other people began to ask the same question, national outrage grew. Across the country, people poured out onto the streets to protest – reminiscent of those calling for justice for Nirbhaya. In my mind, I recalled the national outrage and protests in the early 80s after the Mathura and Rameeza Bee cases, where both women were raped while in custody. Back in those days, as a young lawyer and feminist, these were the cases one studied to understand sexual violence and rape laws. One heard stories of how the women’s movement came out to the streets to demand better laws for rape survivors.

Their relentless activism led to a number of progressive amendments to criminal law on rape. Higher sentences for cases involving custodial rapes were brought in, and more importantly, the burden of proof was shifted away from women. For me this was the first example of how public protests and shared outrage can bring positive change.

In the aftermath of the Nirbhaya case and ensuing public outrage, a number of much-needed amendments were made to the Indian Penal Code. The definition of rape was expanded to include all forms of non-consensual penetrative sexual contact. Enhanced punishments were also brought in for rapes committed during communal or sectarian violence. This, I thought to myself, is good. It is proof that our criminal laws can evolve to the needs of times, and that is always reassuring for a democracy.

Proposals for legal reform have now followed in the aftermath of the Kathua and Unnao protests. But this time, I find myself asking, will more laws and amendments solve the issue of sexual violence against women? Personally, this is almost an existential conundrum. As a trained lawyer, my faith has always been in the law. It is a recourse to which I naturally and instinctively cling. For me to question this is a bit unsettling.

Perhaps it is the kind of amendments, and the swiftness with which they have come about that is worrying. These seem to be passed hastily to calm national sentiment, without the due consideration afforded to past amendments. In particular, the Ordinance moved by the Central Government which stipulates the death penalty in cases of child rape is most worrying.

Experts and fellow colleagues who have spent years working on child safety and rights issues are almost unanimous in their opposition to this Ordinance. There is every chance that as a result of this Ordinance, reporting of child rape cases may actually decrease. This is because a majority of child rape cases are committed by people who are related or known to the child. This also puts the lives of the children in danger, as they are most often the only witnesses.

Apart from the institution of the death penalty, the Ordinance pays little heed to the inadequacies of the criminal justice system, or the challenges of accessing justice in cases of child rape. It also fails to address a key issue that has arisen in both the recent cases—direct political intervention in favour of the accused.

In Kathua, ministers of the ruling party actively participated in the protests led by the Jammu Bar Association against the charge sheet being filed. In Unnao, the law enforcement officials only took action after the High Court ordered the arrest of the Member of Legislative Assembly (MLA) accused of the rape. What this clearly indicates is political will to not bring perpetrators to justice.

Another aspect the Ordinance fails to address is the communal nature of the offence. In Kathua, rape and murder was allegedly used as a tool to settle scores against the nomadic (Muslim) Gujjar-Bakarwal community. While the communal card was played by local Hindutva groups—the Hindu Ekta Manch, and political parties, which claimed that the Crime Branch of Jammu and Kashmir Police was framing the accused, the communal aspect of the crime has largely been ignored by the political class.

Regrettably, this silence doesn’t come as a surprise. Politicians often bare their sexist and communal beliefs without fear of sanction or rebuke. At his swearing in ceremony, Jammu and Kashmir’s Deputy Chief Minister called the Kathua case – the rape and murder of an eight-year-old child – a ‘minor incident’. Yogi Adityanath, before becoming the Chief Minister of Uttar Pradesh openly claimed – “Women are not capable of being free or independent.”

This brings me back to my existential struggle. How can ANY legal reform on rape work if these attitudes persist, particularly among policy makers and those holding power?  Passing laws are relatively easy. Ensuring true safety and justice for our children and women is another matter altogether. The time has come for us to hold our leaders accountable.

As the country approaches the national elections next year, let us hold them accountable for failing to prevent sexual violence, for failing to ensure that justice is done in all cases. Let us hold political parties accountable when their members incite communal hatred and perpetuate gender stereotypes.

Because if we don’t, then who will?





Please read the Hindi Version below


अभिप्राय | एक जूठ को जूठ ही कहा जाए।

उन्नाव और कठुआ के मामलों की मीडिया पर आयी बाढ़ की खबरों को देखते हुए मैंने मन ही मन सोचा, “यह दोबारा कैसे हो सकता है?”

जैसे ही हजारों अन्य लोगों ने वही प्रश्न पूछना आरंभ किया, राष्ट्रीय आक्रोश बढ़ा। देश भर में, लोग विरोध प्रदर्शित करने के लिए सड़कों पर उतर आये – बिल्कुल वैसे ही जैसे निर्भया के लिए न्याय मांगने के लिए सड़कों पर उतर आये। मेरे मन में, मैंने मथुरा और रमीज़ा बी मामलों के बाद हुए 80 के दशक के आक्रोश और विरोध प्रदर्शनों को याद किया, जहां दोनों महिलाओं के साथ कारागार में बलात्कार किया गया था। उन दिनों में, ये वे मामले थे जिनका अध्ययन एक युवा वकील और महिलावादी के रूप में, यौन उत्पीड़न और बलात्कार कानूनों को समझने के लिए किया जाता था। बलात्कार पीड़ितों के लिए बेहतर कानून की मांग करने के लिए कैसे  महिलाओं के आंदोलन सड़कों पर उतर आते थे उससे जुड़े किस्से सुनाई पड़ते थे।

उनके निरंतर आंदोलन बलात्कार पर आपराधिक कानून में कई प्रगतिशील संशोधन के कारण बने। कारागार में हुए बलात्कार से जुड़े मामलों के लिए उच्चतर सज़ा के प्रावधान किये गए, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ‘सिद्ध करने की जिम्मेदारी’ (बर्डन ऑफ़ प्रूफ) महिलाओं से हटा दी गयी। मेरे लिए यह पहला उदाहरण था कि कैसे सार्वजनिक विरोध और साझा आक्रोश सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

निर्भया मामले के परिणाम स्वरुप और सार्वजनिक आक्रोश के बाद, भारतीय दंड संहिता में कई आवश्यक संशोधन किए गए। सभी गैर- सहमतिहीन प्रवेशक यौन संपर्कों के सभी रूपों को शामिल करने के लिए बलात्कार की परिभाषा का विस्तार किया गया था। सांप्रदायिक या कट्टरपंथी हिंसा के दौरान किए गए बलात्कारों के लिए वर्धित दंड के प्रावधान  भी लाए गए थे। यह, मैंने मन ही मन सोचा कि उचित है। यह प्रमाण है कि हमारे आपराधिक कानून समय की जरूरतों के अनुसार विकसित हो सकते हैं, और यह एक लोकतंत्र के लिए हमेशा आश्वस्त करने वाली बात है।

कठुआ और उन्नाव विरोधों के परिणाम स्वरुप अब कानूनी सुधार के प्रस्ताव लाये जा रहे हैं।   लेकिन इस बार, मैं खुद से पूछ रही हूँ कि क्या और अधिक कानून और संशोधन महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा के मुद्दे का समाधान करेंगे? व्यक्तिगत रूप से, यह लगभग एक अस्तित्वपरक पहेली है। एक प्रशिक्षित वकील के रूप में, मेरा विश्वास कानून में हमेशा रहा है। यह एक सहारा है जिससे मैं स्वाभाविक रूप से और सहजता से चिमटती हूं। मेरे लिए इस पर प्रश्न करना कुछ हद तक बेचैन करने वाला है।

शायद यह जिस स्वरुप का संशोधन है, और जिस तेज़ी से उनके द्वारा इसे कार्यान्वित किया जा रहा है वह चिंताजनक है। ऐसा लगता है कि पिछले संशोधनों पर उचित विचार किए बिना, राष्ट्रीय भावना को शांत करने के लिए जल्दबाजी में इन्हें पारित किया जा रहा है। विशेष रूप से, केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत अध्यादेश जो बाल बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड को निर्धारित करता है वह सबसे अधिक चिंताजनक है।

विशेषज्ञ और सहकर्मी जिन्होंने बाल सुरक्षा और अधिकार के मुद्दों पर कार्य करते हुए कई वर्ष बिताए हैं, इस अध्यादेश के विरोध में लगभग सर्वसम्मत हैं। ऐसी पूरी-पूरी संभावना है कि इस अध्यादेश के परिणामस्वरूप, बाल बलात्कार के मामलों की रिपोर्टिंग वास्तव में कम हो सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकांश बलात्कार के मामले उन लोगों द्वारा किए जाते हैं जो बच्चे के रिश्तेदार हैं या बच्चे के जानकर हैं। यह बच्चों की जान को भी खतरे में डाल देता है, क्योंकि अक्सर वे एकमात्र गवाह होते हैं।

मृत्युदंड की संस्था के अलावा, यह अध्यादेश आपराधिक न्याय प्रणाली की अपर्याप्तताओं, या बाल बलात्कार के मामलों में न्याय तक पहुंच पाने की चुनौतियों पर बहुत थोड़ा ध्यान देता है। यह वर्तमान मामलों में उठाए गए एक प्रमुख मुद्दे को हल करने में भी विफल रहता है- आरोपी के पक्ष में प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप।

कठुआ में, आरोप पत्र दायर किये जाने के विरोध में जम्मू बार एसोसिएशन के नेतृत्व में किये गए विरोध प्रदर्शनों में शासक पार्टी के मंत्रियों ने सक्रिय रूप से सहभागिता की थी। उन्नाव में, कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने उच्च न्यायालय ने बलात्कार के आरोप में विधानसभा के सदस्य (एमएलए) की गिरफ्तारी का आदेश देने के बाद ही कार्रवाई की। यह स्पष्ट रूप से अपराधियों को न्याय के सामने नहीं लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति को इंगित करता है।

अन्य एक पहलू जिसे संबोधित करने में अध्यादेश असफल रहता है वह है अपराध का  सांप्रदायिक स्वरुप। कठुआ में, कथित रूप से बंजारा (मुस्लिम) गुज्जर-बकरवाल समुदाय के विरुद्ध हिसाब बराबर करने की (बदले की) भावना के साधन के रूप में बलात्कार और हत्या का उपयोग  किया गया था। जबकि हिंदू एकता मंच जैसे स्थानीय हिंदुत्व समूहों और राजनीतिक दलों द्वारा सांप्रदायिक कार्ड खेला गया था, जिसके तहत उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा आरोपी पर झूठा आरोप लगा रही है, यहाँ अपराध के सांप्रदायिक पहलू को राजनीतिक वर्ग द्वारा बड़े पैमाने पर नजरअंदाज कर दिया गया है।

खेदजनक रूप से, इस चुप्पी से कोई आश्चर्य नहीं होता। राजनेता अक्सर अपनी लैंगिकवादी और सांप्रदायिक मान्यताओं को स्वीकृति या निंदा के डर के बिना प्रकट करते हैं। अपने शपथ ग्रहण समारोह में जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री ने आठ वर्ष की बच्ची के बलात्कार और हत्या संबंधित कठुआ मामले को एक ‘मामूली घटना’ करार दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले योगी आदित्यनाथ ने सरेआम दावा किया था कि – “महिलाएं विमुक्त या स्वतंत्र होने में सक्षम नहीं हैं।”

यह मुझे मेरे अस्तित्वपरक संघर्ष पर वापस ले आता है। यदि ये नज़रिये, विशेष रूप से नीति निर्माताओं और शासकों में कायम रहते हों तो बलात्कार से जुड़ा कोई भी कानूनी सुधार कैसे प्रभावी हो सकता है? तुलनात्मक रूप से कानून पारित करना आसान है। हमारे बच्चों और महिलाओं के लिए सही सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना एक और विषय है। समय आ गया है कि हम हमारे नेताओं को जवाबदेह मानें।

देश में अगले साल राष्ट्रीय चुनाव होने जा रहे हैं, आइए उन्हें यौन हिंसा को रोक पाने में विफल रहने के लिए, सभी मामलों में न्याय किया जाता है यह सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए जवाबदेह ठहराएं। आइए राजनीतिक दलों को जवाबदेह ठहराएं जब उनके सदस्य सांप्रदायिक नफ़रत को उकसाते हैं और लिंग रूढ़िवाद को कायम रखते हैं। क्योंकि यदि हम ये नहीं करते हैं, तो कौन करेगा?