कोविड-19 के ख़िलाफ़ जंग की अग्रिम पंक्ति में खड़ी महिला योद्धा: निराशा से घिरे आशा कार्यकर्ता

Amnesty International India
3 June 2020 10:52 am

प्रतिमा*, एक 39 वर्षीय आशा कार्यकर्ता या मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (अक्क्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट), अपने दिन की शुरुआत सुबह 9 बजे करती है। किसी भी व्यक्तिगत सुरक्षात्मक उपकरण के बिना, वह घर-घर जाकर जाँच करती हैं कि किसी को खाँसी, बुखार या अन्य लक्षण हैं या नहीं। अगर कोई लक्षण हो तो वह उन्हें निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ले जाती हैं। अगले दस घंटों में, वह 30 से अधिक घरों की जाँच करती है, कभी-कभी 50 घर भी, समुदाय के साथ संपर्क की कड़ी के तौर पर, उन के स्वास्थ्य पर नज़र रखती है और उन्हें सुरक्षित रहने के बारे में सलाह देती है। अगले दिन, वह फिर से इसी काम के लिए निकल जाती है।

भारत की लड़खड़ाती स्वास्थ्य प्रणाली/व्यवस्था आज कोविड-19 महामारी के खिलाफ देश की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में है। और इस सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के ठीक बीच में हैं 900,000 से अधिक महिलाएँ जिन्हें आशा कार्यकर्ता के नाम से  जाना जाता है, जो इस महामारी से निहत्थे, एक अनदेखी और अनसुनी लड़ाई लड़ रही हैं।

आशा कार्यकर्ता एक सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता है यानी कि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों और चिंताओं के लिए ग्रामीण क्षेत्र और अब शहरी भारत के लिए भी, वह संपर्क की पहली कड़ी हैं। थोड़े से पारिश्रमिक के लिए, वे  स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के बारे में जागरूकता फैलाते हैं , और मौजूदा सरकारी योजनाओं और सेवाओं तक  समुदायों की पहुँच बढ़ाते हैं।

जैसे भारत में कोविड-19 महामारी फैलती गयी, आशा कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारियों में लगातार बढ़ोतरी   की जाती रही  लेकिन उनके लिए मौजूद कमज़ोर सामाजिक और शारीरिक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए कोई बड़े कदम नहीं उठाये गए। 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ‘मॉडल माइक्रो प्लान फॉर कंटेनिंग लोकल ट्रांसमिशन ऑफ कोरोनवायरस वायरस (COVID-19)’ (कोरोनवायरस वायरस के स्थानीय संचरण को रोकने के लिए मॉडल माइक्रो प्लान) के अनुसार, महामारी पर अंकुश लगाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को घर-घर जाने का काम सौंपा गया। उन्हें बीमारी के लक्षण वाले मामलों को रिपोर्ट करने, संपर्कों को ट्रेस करने, दस्तावेज़ीकरण करने, स्थिति पर निगरानी रखने और समुदाय में महामारी के बारे में जागरूकता पैदा करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। कोविड-19 के मामलों की हमारे सामने हर दिन प्रस्तुत की जाने वाली ज़मीनी स्तर की जानकारी, यानी हर राज्य, गाँव या वार्ड के आंकड़े, मुख्य रूप से इन्हीं आशा कार्यकर्ताओं की मेहनत और पसीने का नतीजा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने महामारी के दौरान आशा कार्यकर्ताओं की चिंताओं और माँगों को समझने के लिए  आठ से ज़्यादा आशा कार्यकर्ताओं और आशा कार्यकर्ता संगठनों के सदस्यों से बात की।

बिना सुरक्षा, पूरा काम

पिछले दो महीनों में, ‘स्वास्थ्यकर्मी’ शब्द को नर्स और डॉक्टरों से अत्यंत सहजता से जोड़े जाने के चलते, हमने उनके काम का सम्मान किया है, अपनी सुरक्षित बालकनियों में खड़े होकर उनकी सुरक्षा के लिए अपील की है और सोशल मीडिया पर उनकी प्रतिबद्धता को सराहा है।

प्रदर्शन की इस शानदार श्रंखला में, आशा कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षा की अपील नदारद रही जबकि वे भी स्वास्थ्यकर्मी ही हैं और लगातार शारीरिक और मौखिक हमलों का सामना करने, वायरस संक्रमण का शिकार होने और बिना आराम के हर दिन काम करने की थकावट के बावजूद अपना काम जारी रख रही हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के साथ अपनी व्यथा बाँटते हुए, महाराष्ट्र के सुरुल जिले की एक आशा कार्यकर्ता ने कहा, “हम हर दिन जाते हैं और लोगों से पूछते हैं कि उन्हें कोई लक्षण हैं या नहीं। लेकिन मास्क, दस्ताने आदि के बिना हम पूरी तरह से असुरक्षित हैं। जिस शॉल को मैं अपने चेहरे पर बाँधती हूँ वह सिर्फ दिलासा देने के लिए है। मुझे पता है कि वास्तव में यह मेरी सुरक्षा नहीं करेगी ।”

20 अप्रैल 2020 को, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अपने दिशानिर्देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की दुर्दशा को स्वीकार किया। मंत्रालय ने राज्य सरकारों को स्वास्थ्यकर्मियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) के लिए उचित प्रावधान करने और उनके वेतन का समय पर भुगतान करने का निर्देश दिया। यह भी कहा गया कि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के, कोविड-19 के बिना लक्षण वाले मरीज़ों के संपर्क में आने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों की भी जाँच की जाएगी। लेकिन, आशा कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षात्मक मानकों की लकीर, अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की तुलना में नीचे खींची गयी है। मंत्रालय के ‘व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के तर्कसंगत इस्तेमाल’ से संबंधित दिशानिर्देशों में अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के मुकाबले आशा कार्यकर्ताओं को ‘कम जोखिम’ की श्रेणी में रखा गया है और उनकी सुरक्षा के लिए तीन सतहों वाले मास्क और दस्तानों के इस्तेमाल की सिफारिश की गयी है। लेकिन असलियत में, आशा कार्यकर्ताओं को इन न्यूनतम सुरक्षा उपकरणों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

“हमें इस्लामपुर के हॉटस्पॉट क्षेत्र में जाने के लिए कहा गया, जहां एक 25-सदस्यीय परिवार के 22 लोगों को जांच करने पर वायरस से संक्रमित पाया गया था। कई आशा कार्यकर्ताओं ने जाने से मना कर दिया, लेकिन मैं मान गई। मुझे पता है कि यह काम महत्वपूर्ण है। हमें बिना किसी मास्क या दस्तानों के वहाँ भेजा गया। एक टीवी साक्षात्कार देने के बाद ही हम सभी को 10-10 मास्क दिए गए। यह एक साधारण मास्क है जिसे हम धो-धोकर दोबारा इस्तेमाल करते हैं क्योंकि हमें इनके अलावा और मास्क नहीं दिये गये हैं”, महाराष्ट्र के सांगली जिले के इस्लामपुर के आस-पास काम करने वाली आशा कार्यकर्ताओं में से एक ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया।

कई मीडिया रिपोर्टों द्वारा आशा कार्यकर्ताओं की कार्य स्थिति के खुलासे के बाद, कुछ राज्यों ने उन्हें सुरक्षात्मक मास्क दिए। लेकिन कई स्थानों पर, आशा कार्यकर्ता अभी भी ग्राम पंचायतों (ग्राम सभा) या नगर निगमों की दया पर निर्भर हैं, जो आगे ज़िला प्रशासन पर निर्भर हैं। इस कारण, कुछ पंचायतों को सुरक्षा उपकरण प्राप्त हुए हैं जबकि अन्य पंचायतें अभी भी उनकी राह देख रही हैं। जिन पंचायतों तक उपकरण पहुंचे हैं, उनमें से भी ज़्यादातर मामलों में मिलने वाले उपकरणों में दस्ताने नहीं है।

कुछ राज्यों में विरोध प्रदर्शनों से फ़र्क पड़ा है, लेकिन कार्यकर्ताओं के मन में स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रशासनिक कार्रवाई का डर बना हुआ है। हरियाणा में आशा कार्यकर्ता यूनियन ने, अपने एक सदस्य को कोविड संक्रमण होने पर उन्हें अस्पताल में उचित सुविधाएँ नहीं मिलने पर, काम बंद कर दिया और एक विरोध प्रदर्शन भी किया। विरोध प्रदर्शन के बाद, उन्हें बेहतर स्वास्थ  केंद्र ले जाया गया।

काम ज़्यादा, वेतन कम

हालांकि आशा कार्यकर्ताओं का पारिश्रमिक अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है, लेकिन मोटे तौर पर उन्हें मिलने वाला भुगतान बहुत कम है। उन्हें एक तय मासिक तनख्वाह के साथ प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य, टीकाकरण आदि को बढ़ावा देने के आधार पर प्रोत्साहन राशि दी जाती है। ज़्यादातर राज्यों में उन्हें मिलने वाली मूल प्रोत्साहन राशि ₹2000 (26 अमरीकी डॉलर) से ₹3000 (70 अमरीकी डॉलर) के बीच होने के चलते उनका ‘वेतन’ बहुत ही कम है। अतिरिक्त भुगतान विभिन्न योजनाओं के अनुसार होता है, जैसे गर्भवती महिलाओं की सांस्थानिक (स्वास्थ केंद्र में) डिलीवरी में सहायता के आधार पर प्रोत्साहन राशि दी जाती है। योजना की शर्तों से जुड़ी यह राशि मिलने में भी अक्सर देरी होती है और दो या तीन महीने ज़मीनी स्तर पर अथक परिश्रम करने के बाद, आशा कार्यकर्ता को जमा बकाया राशि एक साथ दी जाती है। कोविड-19 राहत कार्य के तहत इनकी ज़िम्मेदारियों की सूची में और काम जोड़ दिए गये हैं, वह भी सिर्फ ₹1000 के नगण्य और अपर्याप्त अतिरिक्त पारिश्रमिक के साथ।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए, एक आशा कार्यकर्ता जो कि पुणे, महाराष्ट्र में रहने वाली अकेली माँ भी है, ने कहा, “सुना है कि सरकार ने कोविड-19 सर्वेक्षण कार्य के लिए अतिरिक्त ₹1000 देने की घोषणा की है। मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं लेकिन यह बहुत कम है। हम यहाँ अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। मेरा एक बच्चा है और मैं अपने परिवार में अकेली कमाने वाली सदस्य हूँ। मुझे अपने बच्चे की जिन्दंगी के लिए बहुत डर लगता है।” दूसरी आशा कार्यकर्ता ने कहा,

“आमतौर पर महीने में, हमें मिलने वाले ₹3000 के अलावा, डिलीवरी में मदद करने और टीकाकरण जैसे अन्य कामों के ज़रिये हम अतिरिक्त पैसा कमाते हैं। लेकिन अब क्योंकि हम केवल कोविड-19 सर्वेक्षण का काम कर रहे हैं, हम इन कामों के लिए नहीं जा पा रहे हैं जिसकी वजह से हमारी पहले से ही कम आमदनी पर और ज़्यादा असर पड़ रहा है।”

भारत सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन और आशा कार्यकर्ताओं की जेब तक पहुंचने वाला वास्तविक पारिश्रमिक के बीच बहुत बड़ा अंतर है। 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, देश भर के राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में अधिसूचित न्यूनतम मज़दूरी औसतन ₹422.97 (5 अमरीकी डॉलर) प्रति दिन थी, जिसमें सबसे कम ₹135 (2 अमरीकी डॉलर) नागालैंड में और सबसे ज़्यादा ₹1192 (16 अमरीकी डॉलर) प्रति दिन केरल में थी। लेकिन, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है, वास्तव में, अधिकांश राज्यों में आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाला पारिश्रमिक इससे बहुत कम है।

आशा कार्यकर्ताओं के संगठन पूरे भारत में अपने सदस्यों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं लेकिन उन्हें ज़्यादा सफलता हासिल नहीं हुई है। उदाहरण के तौर पर, अपनी श्रमिक दिवस की अपील में, दिल्ली आशा वर्कर्स यूनियन ने कोविड-19 संबंधित सर्वेक्षण में शामिल महिलाओं के लिए प्रति दिन न्यूनतम ₹750 (10 अमरीकी डॉलर) की मांग की और उनके स्थायी प्रोत्साहन राशि में बढ़ोत्तरी की भी। महाराष्ट्र में, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) से जुड़े आशा संघ ने भी आशा कार्यकर्ताओं के पारिश्रमिक को बढ़ाकर, कुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित न्युन्यतम मज़दूरी जितना तय करने की मांग की है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए, महाराष्ट्र आशा और ब्लॉक फैसिलिटेटर वीमेनज़ यूनियन की सचिव शंकरी पुजारी ने कहा, “सरकार ने सभी अकुशल, अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों के लिए पिछले साल न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई थी। लेकिन आशा कार्यकर्ताओं की मजदूरी को कम ही रखा गया। हम कई वर्षों से इस मांग को उठा रहे हैं, लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ है। सरकार प्रासंगिक श्रम कानूनों के तहत आशाकार्यकर्ताओं को “श्रमिक” की आधिकारिक परिभाषा में शामिल करने से इनकार करती है और इसलिए श्रम क़ानूनों के तहत कार्यकर्ताओं की मुश्किलों को दूर करने के अपने दायित्व से आसानी से बच निकलती है। अब, आशा कार्यकर्ताओं को बिना पर्याप्त मुआवज़े के अपनी जान जोखिम में डालने के लिए कहा जा रहा है।”

महामारी के बाद, विभिन्न राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य कर्मियों को प्रेरित करने के लिए सकारात्मक सुधार किए हैं। लेकिन उनमें से ज्यादातर में, या तो आशा कार्यकर्ताओं को साफ़ तौर पर बाहर रखा गया है या शामिल किये जाने पर भी उन्हें किसी भी प्रकार की प्रभावी सुरक्षा नहीं दी गयी है। उदाहरण के तौर पर, हरियाणा सरकार ने घोषणा किया है कि स्वास्थ्य कर्मियों के वेतन को दोगुना किया जाएगा, लेकिन आशा का उस सूची में उल्लेख ही नहीं है।

“क्या हम भी अपनी ज़िंदगी को खतरे में नहीं डालते हैं? क्या हमारा जीवन महत्वपूर्ण नहीं है?” महाराष्ट्र आशा कार्यकर्ता और ब्लॉक फसिलिटेटर्स महिला संघ की आशा कार्यकर्ता पूछतीं हैं।

इसी तरह, प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण पैकेज के तहत, भारत सरकार द्वारा कोविड-19 से संबंधित कार्य के कारण जान-माल के नुकसान के लिए, सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए ₹50 लाख (66,190 अमरीकी डॉलर) तक के बीमे की घोषणा में भी उन जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है जिसका सामना आशा कार्यकर्ता अपने काम के दौरान करती हैं।

“अगर जान ही नहीं रहेगी तो बीमा का क्या फायदा है?” पुणे आशा वर्कर्स यूनियन की शोभा शमील पूछती हैं। “आशा कार्यकर्ताओं को और किसी सामाजिक सुरक्षा का सहारा नहीं है और उनसे इतने कम वेतन में खुद के इलाज का खर्च उठाने उम्मीद की जा रही है।”

इससे पहले आशा कार्यकर्ताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 की और शहरी इलाकों में 1000-2500 की आबादी सौंपी गई थी। महामारी के बाद से, इसको बढ़ा दिया गया है और अब उन्हें आस-पास के इलाकों के काम की ज़िम्मेदारी भी दी गयी है जिनमें हॉटस्पॉट और नियंत्रण क्षेत्र भी शामिल हैं। इससे उनके लिए काम के दौरान संक्रमण का ख़तरा और ज़्यादा बढ़ गया है। लेकिन, इससे कार्यकर्ताओं के लिए किये गए सामाजिक सुरक्षा उपायों में किसी भी प्रकार की कोई वृद्धि नहीं हुई है।

घरेलू हिंसा और विरोध प्रदर्शन

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत, आशा कार्यकर्ता उसी गाँव या क्षेत्र की निवासी होती हैं जहाँ वे काम करती हैं और आमतौर पर उनकी आयु 25 और 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। उनका 10वीं कक्षा तक औपचारिक रूप से शिक्षित होना ज़रूरी है और आशा कार्यकर्ता बनने के लिए उन्हें प्रशिक्षणों की एक श्रृंखला से गुजरना पड़ता है। मुख्यतः ये महिलाएँ उसी समुदाय से हैं, और उन्ही सामाजिक-आर्थिक संघर्षों से जूझने के साथ-साथ महामारी के ख़तरे का भी सामना कर रही है।

जोखिम भरे हालातों में काम करने के कारण और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने से बचने के लिए, कई आशा कार्यकर्ता अपराधबोध से ग्रसित हो कर अपने परिवारों से दूरी बनाने को मजबूर हैं। “हमें इससे क्या मिलेगा? कुल ₹3000 की कमाई के लिए, हम अपने पूरे परिवार को खतरे में डाल रहे हैं। मेरे पति हर दिन मुझे कोसते हैं,” दिल्ली की एक आशा कार्यकर्ता ने उनका नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया।

घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना भी समाजिक भेदभाव की भावना को उजागर करता है। आशा कार्यकर्ताओं को वायरस के साथ नकारात्मक रूप से जोड़े जाने के कारण, समुदाय और परिवार के सदस्यों द्वारा आशा कार्यकर्ताओं के काम को महामारी रोकने के बजाय फैलाने के काम के रूप में देखा जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए, एक आशा कार्यकर्ता उर्मिला ने कहा,

“मैं रात में बाहर बरामदे में सोती हूँ। मेरी एक दो-साल की बच्ची है, मैं घबराती हूँ कि कहीं उसे संक्रमण न हो जाए।”

कम वेतन पर, बिना किसी पर्याप्त प्रशिक्षण के, अत्यधिक जोखिम वाली परिस्थितियों में काम करने वाली महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने के नाते, आशा कार्यकर्ता कई चुनौतियों का सामना करती हैं। पहले आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर महिलाओं से बात करती थीं जबकि परिवार के पुरुष सदस्य घर में नहीं होते थे। इससे आशा कार्यकर्ताओं के लिए घरों से स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करना आसान होता था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान, आशा कार्यकर्ताओं को घर के पुरुषों की ओर से तिरस्कार और यहाँ तक कि हिंसक व्यवहार का भी सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें परिवार को वायरस संक्रमण देने के खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

आशा कार्यकर्ताओं के अधिकारों के लिए माँगें

28 अप्रैल को, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी सरकारों, नियोक्ताओं, और मज़दूर संगठनों और वैश्विक समुदाय से स्वास्थ्य कर्मचारियों और आपात स्थिति से निपटने वाले कर्मचारियों के व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के संरक्षण काम करने की योग्य स्थिति के उनके अधिकारों के सम्मान करने का आह्वान किया। साथ ही साथ स्वास्थ्य कर्मचारियों के व्यावसायिक स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों को विकसित करने और उन्हें व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए तत्काल कदम उठाने की की अपील भी की गयी।

भारत में लाखों लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाने वाली आशा कार्यकर्ता, जो महामारी के ख़तरों का सामना कर रही हैं, खासकर कार्य की लंबी अवधि, थकान, मनोवैज्ञानिक दबाव, भेदभाव और शारीरिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा; उन्हें स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उपलब्ध सामाजिक और कानूनी सुरक्षा की गारंटी में शामिल करना बेहद ज़रूरी है।

इसके अलावा, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया केंद्र और राज्य सरकारों से तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने की मांग करता है:

  • देश भर में सभी आशा कार्यकर्ताओं के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) की उचित व्यवस्था की जाए, जिसमें समय-समय पर मास्क और दस्ताने बदलने की व्यवस्था भी शामिल हो।
  • आशा कार्यकर्ताओं की सेवाओं को स्थायी बनाया जाए और उन्हें संबंधित श्रम कानूनों के तहत ‘श्रमिक’ की आधिकारिक परिभाषा में शामिल किया जाए।
  • कोविड से संबंधित कार्यों के लिए उचित वेतन दिया जाए और सभी राज्यों में, आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाली मूल प्रोत्साहन राशि को आशा कार्यकर्ताओं की यूनियनों की मांगों और कुशल श्रमिकों के लिए सांविधिक न्यूनतम मज़दूरी के मुताबिक़ बढ़ाया जाए।
  • समुदाय के साथ आशा कार्यकर्ताओं के काम के दौरान कोविड-19 संक्रमण होने की स्थिति में उचित इलाज और काम के नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।
  • कोविड-19 या किसी और वजह से बीमारी होने की स्थिति में इलाज और देखभाल के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा रक्षा दी जाए।
  • सभी राज्यों में फिलहाल खाली पड़े आशा कार्यकर्ताओं के पदों को तुरंत भरा जाए।
  • गर्भावस्था और मातृत्व के दौरान आशा कार्यकर्ताओं की देखभाल के लिए विशेष मातृत्व योजना शुरू की जाए।
  • अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में, जैसे कि कर्मचारी राज्य बीमा और कर्मचारी भविष्य निधि में उन्हें शामिल किया जाए।
  • बीमारियों की रोकथाम और संक्रमण नियंत्रण पर पर्याप्त और नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाए।

स्वास्थ्य का अधिकार, भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ICESCR), जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं, उसके तहत सभी मज़दूरों को काम की उचित और अनुकूल परिस्थितियों का अधिकार है। इसमें न्यायोचित मज़दूरी का अधिकार, समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन, काम करने के लिए सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण, काम की अवधी पर उचित सीमाएं, गर्भावस्था के दौरान और बाद में कर्मचारियों के लिए सुरक्षा, और रोज़गार में समान व्यवहार आदि शामिल है।

आशा कार्यकर्ताओं ने भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक समुदायों की पहुंच में क्रांति का आगाज़ किया है। हालाँकि हम ‘फूलों की सलामी’ और अन्य प्रदर्शनों के ज़रिये उनके प्रति कृतज्ञता दिखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सिर्फ आभार व्यक्त करना काफी नहीं है। उन्हें अपना काम करने के लिए पर्याप्त संस्थागत समर्थन के साथ साथ मानवीय व्यवहार की ज़रुरत है।

“हम जानते हैं, हम मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ASHA ) हैं। हम अपने दिलों में समाज की सेवा करने का ज़ज़्बा लेकर आते हैं,” एक आशा कार्यकर्ता इंदु* ने कहा। “हमने अथक परिश्रम किया है और अधिक काम करने के लिए भी तैयार हैं। लेकिन हम उचित समर्थन के बिना लगातार यह काम नहीं कर पाएंगे।”

इस अभूतपूर्व महामारी के समय, ये महिलाएँ अपरिहार्य साबित हुई हैं। इनकी बुनियादी माँगों को पूरा करके हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में इस तरह की महामारियों के लिए हमारी खुद की तत्परता और समुदाय की इससे लड़ने की क्षमता अधिक मजबूत बने।

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*नाम बदल दिए गए हैं।