कोविड-19 के अदृश्य सिपाही: भारत के सफाईकर्मी, बेहतर सुरक्षा उपकरणों और रोज़गार में बराबरी के लिए सरकार से तत्काल मदद चाहते हैं

Amnesty International India
27 April 2020 4:11 pm

कोविड-19 महामारी एक अभूतपूर्व संकट है जिसने दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन और आजीविका को प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग, खासतौर पर भारत जैसे देशों में, कहीं ज़्यादा प्रभावित हुए हैं। कई देशों में, सरकारें इस तात्कालिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के तरीके खोजने में लगी हैं, और उसके साथ-साथ एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली स्थापित करने की कोशिश भी कर रही है – जो वर्षों की उपेक्षा और निवेश की कमी के कारण जर्जर अवस्था में है।

भारत में कोविड-19 के खिलाफ इस लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में हजारों स्वास्थ्य विशेषज्ञ और स्वास्थ्यकर्मी हैं। लेकिन, उन्हीं में शामिल सफाईकर्मी, उपेक्षित महसूस कर रहे हैं क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें, सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करने के मामले में उन लोगों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है और जिनके काम को समाज में अधिक मान्यता दी जाती है – जैसे कि डॉक्टर, नर्स और अन्य सहायक चिकित्सा कर्मचारी। हालांकि स्वास्थ्य कर्मियों के पास आवश्यक सुरक्षा उपकरण होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन अपने काम की वजह से संक्रमण के खतरे का सामना कर रहे जिन सफाईकर्मियों से हमने बात की, उनमें से अिधकांश को लगता है कि ज़्यादातर सरकारों के लिए सफाईकर्मियों की सुरक्षा और कल्याण का मुद्दा अप्रधान है।

एक सफाईकर्मी का कहना है, “यह उपेक्षा हमेशा से रही है, ऐतिहासिक तौर पर भी, क्योंकि हम दलित हैं।” वह आगे कहते हैं, “जिन गंदी, मैली और मर्यादाहीन परिस्थितियों में हमें काम करने पर मजबूर किया जाता है उनकी किसी को कोई परवाह नहीं है। और आज, इस महामारी के दौरान भी, यह उदासीनता जारी है। हमें कभी भी अपने हाथों से कचरे को छूने की ज़रुरत नहीं पड़नी चाहिए। लेकिन, पहले हमें दस्तानों, रेनकोट, गमबूट्स के लिए लड़ना पड़ता था, आज हमें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट के लिए लड़ना पड़ रहा है। बावजूद इसके कि सफाईकर्मियों को अस्पताल के कचरे को साफ़ करने के साथ-साथ प्रभावित रोगियों की देखभाल करने को भी कहा जाता है।”

उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से भारत में लगभग 50 लाख़ सफाईकर्मी हैं, जिनमें से अधिकांश दलित समुदाय से आते हैं। उनमें से कई या तो नगर निगम या पंचायतों के लिए ठोस कचरा इकट्ठा करते हैं (आमतौर पर इहें सफाई कर्मचारी कहा जाता है) या मलीय (शौच से उत्पन्न) कीचड़ साफ़ करते हैं (नाली, सेप्टिक टैंक इस्त्यादी की सफाई, जिन्हें मैनुअल स्केवेंजर्स (मैला ढोने वालों) के रूप में जाना जाता हैं)।

“इसमें कोई शक नहीं है कि इस कठिन समय में डॉक्टर, नर्स और पुलिस कर्मचारी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। वे इस लड़ाई में अग्रिम पंक्ति के सिपाही हैं। और हम भी हैं। सफाई कामगार भारत को स्वच्छ रखने, और उसके ज़रिये स्वस्थ्य रखने का काम कर रहा है। लेकिन एक फ़र्क है – डॉक्टरों, नर्स, पुलिस [कर्मियों] में सभी समुदायों और धर्मों के लोग हैं – हर वर्ग और जाति के। सफाई कामगार दलित हैं! आप ऊंची जाति के कितने लोगों को कचरा या मैला ढोते हुए देखते हैं? हमारे लिए कोई सुविधा नहीं है – न ही कोई प्रावधान। हम इसी ज़िंदगी में पैदा हुए हैं – हम इसी ज़िंदगी में मर जाएंगे, हमारी ओर से सवाल उठाने वाला कोई नहीं है।”

– दादाराव पाटेकर, स्वच्छताकर्मी और कचरा वाहतुक श्रमिक संघ (केवीएसएस) के उपाध्यक्ष।

 

महामारी में भी आपके शहरों और अस्पताल को कौन साफ रखता है?

sanitation-worker-india

 

सफाईकर्मी, जिनमें से 50% प्रवासी मज़दूर हैं (हमने जिन संगठनों से बात की उनके अनुसार) – उन लोगों  में से  नहीं थे जो अपने घरों को लौटने की कोशिश में शहरों को तत्काल छोड़ कर पलायन कर गए, क्योंकि लॉकडाउन के तहत उठाये गए कदमों से उनकी आजीविका को ख़तरा था। उनका काम (सीवेज/नाली की सफाई आदि में लगे हुए मज़दूरों को छोड़कर), स्वास्थ्य कर्मियों की तरह ही, अभी भी जारी है।

हमने महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में सफाईकर्मियों से और उनके साथ काम करने वाले संगठनों से बात की, ताकि कोविड-19 के संदर्भ में उनके सामने पेश आ रही विशेष चुनौतियों को समझा जा सके। अस्पतालों में काम कर रहे सफाईकर्मियों को मरीज़ों से संक्रमण होने का ख़तरा है, जबकि नगरपालिका के लिए ठोस कचरा इकट्ठा करने वालों को संगरोध वाले घरों के अचिह्नित मेडिकल कचरे को हाथ लगाने से ख़तरा है।

आमतौर पर, स्थायी और अनुबंध (ठेके पर रखे गए) कर्मचारियों, दोनों के प्रति उपेक्षा, निम्नलिखित तरीकों में से एक या अधिक के ज़रिये लक्षित होती है:

  • सभी कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का अपर्याप्त प्रावधान जिसमें चेहरे के लिए मास्क, हाथ के दस्ताने, एप्रन, जूते, सिर ढँकने के लिए उपकरण आदि के साथ-साथ साबुन/सनिटीज़र शामिल हैं। यह “कार्यालयों और आम सार्वजनिक स्थानों के कीटाणुशोधन और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के तर्कसंगत उपयोग” पर केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के विपरीत है।
  • स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा सम्बन्धी प्रावधान (यदि दिए गए हों तो) में गैरबराबरी।
  • स्थायी और अनुबंध (ठेके पर रखे गए) कर्मचारियों को दिए जाने वाले भुगतान और कोविड-19 संबंधित कार्यों के लिए दिए जा रहे अतिरिक्त मुआवज़े में कोई बराबरी नहीं है।
  • ओवर-टाइम करवाना लेकिन उसके लिए अतिरिक्त वेतन (अगर दिया गया तो) में कोई निरंतरता नहीं।
  • सार्वजनिक परिवहन सेवाएँ बंद होने के कारण, सुबह जल्दी ड्यूटी के लिए पहुँचने के लिए परिवहन मिलने में कठिनाई।
  • जो मज़दूर मज़बूरी में मैला ढोने का काम (मैन्युअल स्केवेंजिंग) करते हैं (ज़्यादातर अनौपचारिक अनुबंध के आधार पर) उन्हें इस समय कोई काम नहीं मिल रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता हरनाम सिंह द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में, केंद्र सरकार ने 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट को बताया, कि कोरोनोवायरस महामारी पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी किये गए दिशानिर्देशों के मुताबिक देश में सफाईकर्मियों को आवश्यक सुरक्षात्मक किट दिए जा रहे हैं। इस प्रतिक्रिया और कर्मचारियों ने हमें जो बताया उसमें पूर्ण विरोधाभास है।

मुंबई में, बीएमसी (बृहन्मुंबई नगर निगम) ने निर्देश दिया है कि लॉकडाउन लागू रहने तक, एक वक़्त पर सिर्फ 50% कर्मचारियों, को बारी बरी से बदली के आधार पर, काम पर रखा जाएगा। नगर निगम ने परिवहन और भोजन के खर्च के मुआवज़े के रूप में 300/- रुपये प्रति दिन के अतिरिक्त भुगतान की भी घोषणा की है। लेकिन, अनुबंध के आधार पर रखे गए कर्मचारियों के लिए इन प्रावधानों के संबंध में बीएमसी ने चुप्पी साध ली है। “वे हमें हर दूसरे दिन (एक दिन छोड़ कर दूसरे दिन) काम करने के लिए बुलाते हैं, लेकिन बीच के बिना काम वाले दिनों  के लिए हमें वेतन दिया जाएगा या नहीं, हमें नहीं पता,” अनुबंध के आधार पर काम करने वाले एक कर्मचारी, बाबूराव (नाम बदला गया है), ने यह कहते हुए उस विसंगति की ओर इशारा किया जिसका सामना भारत के लाखों अनुबंध मज़दूर करते हैं।

बाबूराव, जिन्हें मुंबई के चेंबूर में कोविड-19 रोगियों का इलाज करने वाले एक अस्पताल में नियुक्त किया गया है, कहते हैं, “पहले दो दिन हमें सूट को धो कर फिर से इस्तेमाल करने के लिए कहा गया। काम करने से इनकार करने के बाद ही हमें पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) दिए गए ”।

“हम सभी की सुरक्षा के लिए स्थायी कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करते हैं। यह ‘स्थायी’ बनाम ‘अनुबंध ‘श्रमिकों के बीच तुलना का प्रश्न नहीं है बल्कि यह सभी की सुरक्षा का सवाल है। जब कोरोना आएगा, तो वह स्थायी या अनुबंध वाले कर्मचारी के बीच फर्क नहीं करेगा”, दादाराव पाटेकर कहते हैं।

कर्नाटक में, तुमकुर जिले में स्थित पवागडा नगर निगम के लिए काम करने वाले एक सफाईकर्मी को अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत नोटिस जारी किया गया। कारण? उन्होंने नगरपालिका प्रशासन निदेशालय (डीएमए) द्वारा जारी किये गए निर्देशों के अनुसार निगम से सुरक्षात्मक उपकरण देने की मांग की थी।

तमटे संस्था के संस्थापक सचिव और सफाई कर्मचारी कावलू समिति (एसकेकेएस)-कर्नाटक के राज्य संयोजक डॉ.के.बी. ओबलेश का कहना है कि, कर्नाटक के सफाईकर्मी आमतौर पर कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) निगम के अस्पतालों द्वारा मिलने वाली स्वास्थ्य देखभाल संबंधी सेवाएं का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। स्थानीय निकायों ने ईएसआई खातों में कर्मचारियों और उनके खुद के योगदान की राशि जमा नहीं कराई है, जो कि कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा योजना का हिस्सा है, और जिसके कारण कर्मचारियों के पास नए/नवीनीकृत ईएसआई कार्ड नहीं हैं।वर्तमान स्थिति में, अगर उन्हें कोविड-19 संबंधी उपचार की ज़रुरत पड़ती है, तो उनके लिए ईएसआई अस्पतालों का उपयोग करना मुश्किल होगा, उन्होंने कहा।

मलीय कीचड़ (शौच से उत्पन्न) की सफाई (नाली, सेप्टिक टैंक आदि) करने वाले सफाईकर्मियों को अब लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिल रहा है। डॉ ओबलेश के अनुसार, प्रवासी मज़दूर होने के नाते, उनके पास कर्नाटक के राशन और आधार कार्ड नहीं है और इसलिए वे राज्य द्वारा किये गए प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।

तमिलनाडु में मदुरै के पालमेडु क्षेत्र के कर्मचारियों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को बताया कि उन्हें सभी पीपीई उपकरण तभी दिए गए जब उन्होंने नागरकोइल नगर निगम के कर्मचारियों की तस्वीरें दिखाईं, जिन्हें यह किट दिए जा चुके थे। उनमें से कुछ कर्मचारी, जो कीटाणुनाशक छिड़काव के काम में लगे हुए थे, उन्होंने हमें बताया कि उनके शरीर की त्वचा पर चकत्ते हो गए हैं। उन्हें पीपीई उपकरण नहीं दिए गए थे।

हमारे द्वारा किये गए साक्षात्कारों के अनुसार, कर्मचारी औसतन 2 अतिरिक्त घंटे प्रति दिन, बिना छुट्टी के सप्ताह के सातों दिन काम करते हैं।

महिला कर्मचारी खासतौर पर कमज़ोर स्थिति में

sanitation-workers-women

 

लगभग 50% शहरी स्वच्छताकर्मी महिलाएं हैं, जो ज्यादातर नगरपालिकाओं के लिए ठोस कचरा इकठ्ठा करने का, सड़कों की सफाई का और स्कूल के शौचालयों की सफाई का काम करती हैं।

हमने जिन महिला कर्मचारियों से बात की, उनके अनुसार, कोविड के पहले उन्हें जिन व्यावसायिक ख़तरों का सामना करना पड़ता था वे हैं: मज़दूरी में गैर-बराबरी, काम का असुरक्षित माहौल, सुरक्षात्मक उपकरणों की कमी, शहरी इलाकों में उनके लिए शौचालयों की कमी की वजह से होने वाले ख़ास स्वास्थ्य-सम्बन्धी दिक्कतें, गर्भवती होने के समय ली गयी छुट्टियों के लिए वेतन का भुगतान नहीं किया जाना इस्तादि। कोविड के पहले कि इन चुनौतियों के अलावा, अब नए इलाकों में दिए गए अतिरिक्त काम का मतलब है कि, सार्वजनिक परिवहन सेवा की अनुपस्थिति में, महिला कर्मचारियों को सुबह तड़के लंबी दूरी चल कर तय करनी पड़ती है। मदुरै, तमिलनाडु के पास कुछ महिला कर्मचारियों ने बताया कि उनके नए कार्य क्षेत्र में उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। महिला कर्मचारियों के अनुसार, उनके द्वारा इस मुद्दे को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उठाने पर, पुरुषों को फटकार लगाई गयी।

स्कूलों और मोहल्लों के बंद कराये जाने के कारण, जिन महिला कर्मचारियों के साथ हमने बात की, उन्होंने अपने बच्चों को घर पर अकेले छोड़ कर काम पर जाने के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। उनसे उनके बच्चों को संक्रमण होने की आशंका भी उन्होंने व्यक्त की।

महिला कर्मचारियों को दिये जाने वाले भुगतान में गैर-बराबरी पर प्रकाश डालते हुए, इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एजुकेशन, एक्शन एंड स्टडीज (IDEAS) (विकास शिक्षा, कार्रवाई और अध्ययन संस्थान), मदुरै में कार्यरत उमा कहती हैं,

हालाँकि सभी पंचायतें अतिरिक्त कीटाणुनाशन कार्य के लिए भुगतान नहीं करती हैं, लेकिन जो पंचायतें भुगतान करती हैं, वे पुरुषों को 500 रुपये प्रति दिन और महिलाओं को उससे कहीं कम 250 रुपये प्रति दिन देती हैं।

 

शोषण करने की आसानी

sanitation-workers-blog

 

आज के, लॉकडाउन के समय में मज़दूरों को संगठित करना एक चुनौती है। कचरा वाह्टुक श्रमिक संघ (KVSS) के  संस्थापक और महासचिव, मिलिंद रानाडे के अनुसार, “पिछले 20 वर्षों में, उन ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है जिनका काम असल में बारहमासी और वैधानिक है। क्योंकि ज़्यादातर ठेके के ज़रिये रखे गए मज़दूर दलित और प्रवासी हैं, इनका शोषण ज़्यादा आसानी से किया जा सकता है”।

दादाराव पाटेकर कहते हैं, “कई वर्षों के संघर्ष और संगठन के कारण ही, आज केवीएसएस से जुड़े 6,500 ठेके पर रखे गए कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिल रहा है“।

विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर संगठन, वाटरएड और विश्व स्वस्थ्य संगठन की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्थायी कर्मचारियों की काम करने की बुनियादी स्थिति कुछ हद तक क़ानूनों के तहत संरक्षित है। लेकिन, ज़्यादा जोखिम और अवांछनीय काम वाली नौकरियाँ आगे ठेके पर अनौपचारिक मज़दूरों को दे दीं जाती हैं, अर्थात ऐसे ठेके पर रखे गए या आकस्मिक मज़दूर, जिन्हें क़ानूनों के तहत काफी कमजोर या कोई भी संरक्षण प्राप्त नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, आकस्मिक मज़दूरों को स्थायी मज़दूरों की तुलना में तीन गुना कम वेतन मिलता है। उत्तरोत्तर अनुबन्धीकरण की परत दर परत, अनुबंध पर रखे गए और आकस्मिक मज़दूरों की आवाज़ों को डुबो देती हैं।

रानाडे ने संक्षिप्त में कहा, “यह ‘व्यापार करने में आसानी’, शोषण करने की आसानी के अलावा कुछ नहीं हैं”।

 

कोविड-19 संबंधी मृत्यु के लिए सरकार द्वारा जारी की गयी बीमा योजना

sanitation-workers-COVID-19

 

केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन के पहले चरण के दौरान 26 मार्च को घोषित किये गए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज में, स्वास्थ्य कर्मियों के लिए कोविड-19 संबंधित मृत्यु के लिए, 90 दिनों की अवधी वाली 50 लाख की बीमा योजना का प्रावधान किया गया है, जिसमें अस्पतालों में काम करने वाले स्वच्छताकर्मियों को भी शामिल किया गया है। लेकिन इस योजना में अस्पतालों में अनुबंध के आधार पर रखे गए कर्मचारी भी इसमें शामिल हैं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। इससे उन कर्मचारियों को भी बाहर रखा गया है जो शहरों और कस्बों से ठोस कचरा इकट्ठा करते हैं, जिनमें संगरोध क्षेत्र भी शामिल हैं।

24 मार्च को, तमिलनाडु, पहला राज्य था जिसने, अस्पतालों के ससफाईकर्मियों सहित, सभी स्वास्थ्य कर्मियों को एक महीने का विशेष वेतन देने की घोषणा की। दिल्ली सरकार ने, 2 अप्रैल को, स्वास्थ्य और स्वच्छता कर्मचारियों के लिए, कोविड-19 से संबंधित मृत्यु के लिए एक करोड़ की बीमा योजना की घोषणा की।

पंजाब ने 4 अप्रैल को पुलिस और स्वच्छता कर्मचारियों के लिए 50 लाख की विशेष स्वास्थ्य बीमा योजना की घोषणा की। 17 अप्रैल को बृहत्तर मुंबई नगर निगम (MCGM) ने सभी MCGM कर्मचारियों के लिए कोविड-19 संबंधित मृत्यु के लिए 10 लाख के मुआवज़े की घोषणा की, जिसमें ठेके पर रखे गए कर्मचारी भी शामिल है, जिन्हें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज से बाहर रखा गया है।

सरकार को किन तात्कालिक कदमों को उठाने की आवश्यकता है

sanitation-workers

 

सभी मज़दूरों को, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध (ICESCR) में निहित अपने कार्य के लिए न्यायोचित और अनुकूल परिस्थितियों का अधिकार है, और इस अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध को भारत ने भी अनुमोदित किया है। इसमें न्यायोचित मज़दूरी का अधिकार, समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन, काम करने के लिए सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण, काम की अवधी पर उचित सीमाएं, गर्भावस्था के दौरान और बाद में कर्मचारियों के लिए सुरक्षा, और रोज़गार में समान व्यवहार आदि शामिल है।

केंद्र और राज्य सरकारों को भारत के सफाईकर्मियों योगदान को गौरव पूर्ण स्थान देते हुए निम्नलिखित कदमों को तुरंत लागू करना चाहिए:

  1. सभी सफाईकर्मियों को आवश्यक कर्मचारियों के रूप में मान्यता दी जाए और उपलब्ध सुरक्षात्मक उपकरणों, राहत और पुनर्वास का समान प्रावधान किया जाए।
  2. महिला सफाईकर्मियों सहित स्थायी एवं अनुबंध सफाईकर्मियों अच्छी गुणवत्ता वाले और पर्याप्त मात्रा में पूर्ण पीपीई किट दिया जाना सुनिश्चित किया जाए।
  3. पीपीई किटों की पर्याप्त मात्रा में और गुणवत्ता के साथ आपूर्ति के उल्लंघन के लिए ठेकेदारों और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
  4. सभी कोविड-19 संबंधित कार्यों के लिए, रोज़गार की शर्तों की परवाह किए बिना, सभी सफाईकर्मियों लिए समान और पर्याप्त वित्तीय क्षति पूर्ति सुनिश्चित की जाए।
  5. काम करने की जगह पर दुर्व्यवहार, भेदभाव और अन्य प्रकार की हिंसा से सभी कर्मचारियों, खासकर महिला कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  6. क्योंकि सफाईकर्मियों लॉकडाउन के दौरान आवश्यक कार्य कर रहे हैं, इसलिए उनके बच्चों के लिए पर्याप्त देखभाल और सुरक्षा प्रदान की जाए।
  7. सफाईकर्मियों के काम करने की जगहों पर पर्याप्त और सुरक्षित पानी, भोजन, स्वच्छता और खुद को संक्रमण से बचाने के लिए आवश्यक अन्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  8. अपने घरों से कार्य स्थल तक और फिर वापस जा पाने के लिए सफाईकर्मियों को परिवहन सुविधाएँ दिया जाना सुनिश्चित किया जाए।
  9. सफाईकर्मियों को हर हफ्ते काम से छुट्टी दिया जाना और आवश्यकतानुसार अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त किया जाना सुनिश्चित किया जाए।
  10. सफाईकर्मियों सभी मौजूदा ईएसआई स्वास्थ्य योजनाओं का इस्तेमाल कर सकें यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये जाएँ।
  11. स्थायी और अनुबंध पर रखे गए, सभी सफाईकर्मियों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज में शामिल किया जाए।
  12. सफाईकर्मियों नियमित स्वास्थ्य जांच और उनके लिए सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। पैसे का भुगतान कर पाने की क्षमता का अभाव, स्वास्थ्य देखभाल और उपचार से वंचित रखे जाने का कारण नहीं बनना चाहिए।

इस महामारी ने हमारे समाज में मौजूद कई गैर-बराबरियों को उजागर किया है। लेकिन इसने हमें ठहर कर, आत्मचिंतन करने और फिर ज़रूरी सुधार करने का मौका भी दिया है। दादाराव पाटेकर कड़वे सच की ओर इशारा करते हुए कहते हैं,

“कोरोना हो या न हो, अगर सफाई कामगार ने काम बंद कर दिया, तो गन्दगी का ढेर लग जाएगा, आबादी में संक्रमण फ़ैलेगा, और कई लोग मर भी सकते हैं। हम वो अदृश्य मज़दूर हैं जो आपके शहरों और अस्पतालों को साफ रखते हैं। यह काम कोई अपनी पसंद से नहीं करता। ऐतिहासिक अन्याय के कारण हम इस काम में फसें हैं, और हम इसको करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि हमारे पास अपने परिवारों का पेट पालने का और कोई साधन नहीं है।”

हम एक समाज के रूप में, लम्बे समय से सफाईकर्मियों और उनकी परिस्थितियों की अनदेखी करते रहे हैं। हमें यह मानकर चलना बंद कर देना चाहिए कि सुलभ और मूक मानव श्रम हमेशा हमारी सेवा के लिए उपलब्ध रहेंगे। काम करने की जगह पर सुरक्षा और गरिमा, सफाईकर्मियों का भी उतना ही अधिकार है जितना किसी और का। इसलिए, सफाईकर्मियों द्वारा रखी गई इन माँगों को तत्काल पूरा किया जाना चाहिए। इस महामारी के बाद भी सफाईकर्मियों के अधिकारों के अनुपालन के लिए भी हमें लड़ना होगा।

 

लेखन : रीना टेटे और राजकुमारी एम्
अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद : सिद्धार्थ जोशी

रीना टेटे इंडियंस फॉर एमनेस्टी इंटरनेशनल ट्रस्ट (एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया) के जेंडर एंड आइडेंटिटी बेस्ड वायलेंस प्रोग्राम की अगुवाई करती हैं और राजकुमारी एम मानवाधिकार शिक्षा कार्यक्रम का नेतृत्व करती हैं |

सफाईकर्मियों एक्शन इनिशिएटिव फॉर डेवलपमेंट (एआईडी), इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एजुकेशन, एक्शन एंड स्टडीज (आईडीईएएस), कचरा वाह्टुक श्रमिक संघ (केवीएसएस), तमटे (सेंटर फॉर रूरल एम्पावरमेंट) और वेव फाउंडेशन के प्रतिनिधियों के योगदान के साथ।

This was first published in English on 24 April 2020.