केवल समय पर की गयी और प्रभावी कानूनी कार्रवाई ही दलितों पर हो रहे हमलों को कम करेगी

By Amnesty International India
21 August 2018 4:24 pm

14 जनवरी को एक वीडियो ऑनलाइन प्रचारित हुआ जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक दलित युवा, विपिन कुमार को तीन लोगों द्वारा लाठियों से पीटा जाना दिखाई पड़ रहा था। देखा जा सकता है कि कुमार के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है, उसे लातों से मारा जा रहा है और ‘जय माता दी’ बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है क्योंकि हमलावरों का दावा है कि उसने उनके देवताओं का अपमान किया था।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में कहा गया कि एक महीने पहले जो घटना हुई उसके जवाब में यह हमला हो सकता है, जब दलित पुरुषों के एक समूह ने कथित तौर पर अन्य दलितों के घरों में हिंदू देवताओं की तस्वीर और मूर्तियों को बी. आर. आंबेडकर की तस्वीरों के साथ बदल दिया था। स्थानीय हिंदू समूहों ने बाद में आपराधिक शिकायत दायर की थी। विपिन के पिता ने इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ( Indian Express newspaper) को बताया कि अक्टूबर में सौ से अधिक दलितों ने बौद्ध धर्म में परिवर्तित होकर स्वेच्छा से अपनी हिंदू मूर्तियों को त्याग दिया था।

अन्य लोगों की तरह दलितों को भी अपने धर्म का चयन करने का अधिकार है। अपने अधिकारों का दावा करने के लिए दलितों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं भारत में व्यापक हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम – एक ऐसा कानून है जो दलितों के खिलाफ नफ़रत के अपराधों को “अत्याचार” के रूप में दंडनीय बनाता है, उसे लागू करके राज्य इसका जवाब देने के लिए सुसज्जित है। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, इस कानून के तहत अपराध पुलिस द्वारा अक्सर पंजीकृत नहीं किये जाते हैं, जिससे हमलावरों के लिए दण्ड मुक्ति सुनिश्चित होती है। केवल समय पर की गयी और प्रभावी कानूनी कार्रवाई ही दलितों पर हो रहे हमलों को कम कर सकती है।